Saturday, December 24, 2011

चुनाव का बजा बिगुल, राजनीतिक दल हत-बल

          आज देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव घोषित हो गए हैं. उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की गहमा-गहमी बढ़ गयी है. कांग्रेस, भाजपा, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी सत्ता के खेल के मुख्य खिलाड़ी हैं. इन सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस बार के विधान सभा चुनाव को  केन्द्र की सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी मान अपना हर कस-बल दाँव पर लगा रखा है.
          बिना संगठन के मजबूत ढाँचे के कांग्रेस अपने सबसे होनहार नायक राहुल गांधी के भरोसे है. एक पुराने कांग्रेसी नेता मानते हैं की बिना जनता में सीधे जाए कुछ नहीं होने वाला. आज प्रदेश में कांग्रेस  के प्रत्याशी  ये मानकर चल रहे हैं की जब और जिस भी विधान-सभा में राहुल या सोनिया जी आ जायेंगी बस सारे वोट उसे ही मिल जायेंगे. ऐसा नहीं है. जनता से बढ़ी दूरी इन कांग्रेसी प्रत्याशियों की सबसे बड़ी समस्या है. जिससे उबरने का मंत्र उनके पास नहीं है. 'वों' ये नहीं समझ पा रहे हैं की जनता उन्हें क्यों वोट करे ???  देश-व्यापी बढ़ती महँगाई, काला धन वापसी की मांग और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का प्रभाव इस बार के विधान सभा चुनाव  में जरूर पडेगा.  दिग्विजय, चिदंबरम, ए . राजा , कलमाडी  और कपिल सिब्बल की बदनामी और अलोकप्रियता का असर भी इस पार्टी के चुनाव-अभियान पर पडेगा.
          दूसरी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा है. जिसमें हतबल और ऊर्जाहीन नायकों का जमावडा है. इस दल में कोई भी अपने दल के प्रति समर्पित नहीं है. सभी इस दल के झूठे राष्ट्रनायकों के इर्द-गिर्द "गणेश-परिक्रमा" में व्यस्त है. पूरी पार्टी कबीलावादी संस्कृति से सराबोर है. प्रदेश के कई प्रभारी हैं और सभी अपने चुनाव - अभियान में केवल  और केवल अपने समूह से घिरे रहते हैं. छद्म राष्ट्रवादी और छद्म सेकुलरिज्म की खाल ओढ़े ये दल विचारको और बुद्धिजीवियों  का समूह मात्र है. जनता और उसकी समस्याओं से दूर  यह दल क्यों जीतेगा इस दल कों ज़रा भी अंदेशा नहीं है. कांग्रेस का विकल्प कहलाने वाला ये दल वास्तव में कांग्रेस का विकल्प बनेगा. और इस बार कांग्रेस की भाँति प्रदेश में चौथा स्थान पाने में सफल रहेगा.
         बहुजन समाज पार्टी के लिए ये चुनाव अपने अस्तित्व और अस्मिता का सवाल है. घर में हारे तों जग से  हारे.  बिना किसी विचार और नीति के  केवल सत्ता पर काबिज रहने की जरूरत ने जनता  की निगाह में इस दल कों सबसे अलोकप्रिय हालात में पहुंचा दिया है. सरकारी अधिकारियों की दम पर वसूली करती सरकार अपनी प्रासंगिकता खो बैठी है. पार्टी का हर तीसरा विधायक और दूसरा मंत्री लोकायुक्त की जांच के दायरे में है. सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या से सबसे नजदीक रहने की संभावना मन में पाले इस दल (बहुमत या सरकार न बना पाने की स्थिति में) में आंतरिक लोकतंत्र की कमी हर चुनाव के बाद टूटन का कारण बनती रही है. यही कमी शेष राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी संभावना है. पार्टी और सरकार के सभी बड़े पदों पर काबिज रहे व्यक्तियों की गतिविधियां आज कानूनी दायरे में हैं. लगभग दहाई की संख्या में विधायक जेल में हैं. पार्टी का जनाधार खिसक गया है. सरकार-विरोधी रोष भी जनता में व्याप्त है.
          और अंत में बात सत्ता के खेल में सबसे बड़ी संभावनाओं वाली समाजवादी पार्टी की. पिछले विधान सभा के चुनाव में "पिछड़ा जातियों के महासमूह" की निर्माण की अति महत्वाकांक्षी योजना के तहत कल्याण सिंह के साथ से बिदके मुसलमान आज तक पूरी तरह साथ नहीं आ सके हैं. कांग्रेसनीत केंद्र की सरकार द्वारा पिछडों की कीमत पर मुसलामानों कों सरकारी नौकरियों पर दिए गए आरक्षण पर समाजवादी पार्टी की चुप्पी से पिछडों के वोट बैंक में भाजपा की सेंध की आशंका है. भाजपा का हिंदुत्व के नाम पर पिछडों कों अपने पक्ष में ललचावाना  पार्टी के लिए घातक साबित हो सकता है. पार्टी अगर पिछडों के लिए मुसलामानों का विरोध करे तों रहे सहे मुसलमानों के वोट के भी खो जाने का ख़तरा है. पश्चिम उत्तर प्रदेश में लोकदल और कांग्रेस का जुड़ाव और सलीम शेरवानी, हाजी रशीद मसूद, राज बब्बर की दूरी से मुस्लिम वोट बैंक पार्टी से दूर हो चला है. रही सही कसर  पूर्वांचल में पीस पार्टी, अमर सिंह की लोकमंच और बेनी प्रसाद वर्मा की जुदाई ने पूरी कर रखी है. शहरी मतदाताओं ने सदा ही इस पार्टी के अपराधिक प्रवृत्ति के प्रत्याशियों की बहुलता के कारण दूरी बनाए रखी है. सपा के शीर्ष परिवार की आतंरिक कलह भी जग-जाहिर हो चुकी है. प्रत्याशियों की फेहरिस्त में बारम्बार फेरबदल  से पार्टी के एक खास तबके में अनावश्यक रोष पैदा हो चुका है जो चुनाव में विजय के रास्ते में रोड़ा बन सकता है.
         इन स्थितियों में सत्ता में अधिकतम हिस्सेदारी पाने के लिए अजीत सिंह का लोकदल, डा. अयूब की पीस पार्टी, कृष्णा पटेल की अपना दल,अमर सिंह की राष्ट्रीय लोक-मंच  और राजा बुन्देला की बुदेलखण्ड कांग्रेस ने भी अपनी बिसातें बिछा रखी हैं. प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य बहुत स्पष्ट नहीं है. पर इतना सभी दल मानते हैं की दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है. सभी की निगाहें 2014 के लोक सभा चुनावों पर गड़ी हैं. सारे राजनीतिक दल इस चुनाव को सत्ता के खेल का सेमी फाइनल मान रहे हैं तों हर्ज भी क्या है ????

3 comments:

  1. बढ़िया समीक्षा

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  2. कौरव कौन
    कौन पांडव,
    टेढ़ा सवाल है|
    दोनों ओर शकुनि
    का फैला
    कूटजाल है|
    धर्मराज ने छोड़ी नहीं
    जुए की लत है|
    हर पंचायत में
    पांचाली
    अपमानित है|
    बिना कृष्ण के
    आज
    महाभारत होना है,
    कोई राजा बने,
    रंक को तो रोना है|

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