Sunday, August 14, 2016

विभीषण का पुनर्जन्म

समयकाल - बीसवी सदी में नब्बे का दशक.
स्थान - उत्तरप्रदेश की राजधानी, लखनऊ.
प्रसंग - त्रेतायुग वाले प्रभु राम का अपने बंधु-बांधवों सहित आजाद भारत में पुनर्जन्म हो चुका है. परन्तु उनके राज्य अवध और मुगलकालीन आगरा को मिलाकर नया राज्य उत्तरप्रदेश बन चुका है. राम को इस राज्य की सत्ता सम्हालनी है यानी मुख्यमंत्री पद हेतु कल बहुमत साबित करना है.


............पार्टी कार्यालय के एक बड़े हाल भूमि में बिछी दरी में समाजवादी या अफगान राजशाही के अनुसार प्रभु राम, अपने प्रमुख सलाहकार जाम्बवंत, हनुमान, सुग्रीव, अंगद, नल-नील, भरत, शत्रुघ्न, लव, कुश और तमाम बंधू-बांधवों के साथ गहन चिंतनीय मुद्रा में बैठे हैं.....
लम्बी चुप्पी तोड़ते हुए जाम्बवंत बोले- "सब तरफ से गिन लिया है, लेकिन बहुमत का इंतजाम नहीं हो पा रहा है...... कुछेक विधायकों की कमी पड़ जा रही है...."
प्रभु राम लम्बी सांस लेते हैं......रामादल में गहरा सन्नाटा पसरा है.....
तभी प्रभु राम की जय हो कहकर लक्ष्मण का प्रवेश होता है.....
उनके चेहरे का हर्ष और जोश देखकर सबके चेहरों में चैतन्यता आ जाती है.
प्रभु राम ने हर्ष का कारण पूछा तो वो बोले, "अब चिन्ता त्यागिये प्रभु....हम सब के साथ ही विभीषण का भी पुनर्जन्म हो चुका है. निश्चित ही, कल बहुमत का इंतजाम हो जायेगा".
हनुमान जी ने जोर से रामजी का जयकारा लगाया.



 

Friday, June 3, 2016

कितना विज्ञापन हो ???

दोस्तों,
उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनावों की आहट सुनाई देते ही यहाँ देशभर के राजनेताओं और राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार-प्रसार प्रारम्भ कर दिया है.
सुशासन बाबू पहले ही अपने दल को राष्ट्रीय रूप देने के लिए उत्तरप्रदेश के दौरे पर हैं.
यदि पंजाब के अकालीदल को आगामी चुनावों में सफलता मिलती है तो वो भी उत्तरप्रदेश में हाथ आजमाएगी.
कई बार शिवसेना ने यहाँ अपने कट्टर हिन्दूवाद के नाम पर चुनावों में प्रत्याशी उतारे हैं, किन्तु उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्त की.
हैदराबाद के ओवैसी भी 2017 में आने वाले हैं.
दिल्ली राज्य वाले अरविन्द केजरीवाल भी अभी नहीं तो कभी भी उत्तरप्रदेश की तरफ निगाहें जमाये हैं. यहाँ का एक ख़ास शहरी वर्ग उनके स्वागत में उद्विग्न है. उनके विज्ञापन भी अक्सर हिन्दी और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में शोभा बढाते रहते हैं. उत्तरप्रदेश में क्षेत्रीय इलेक्ट्रोनिक चैनलों में भी उनका विज्ञापन आता रहता है.
अभी हाल में देश के प्रधान-सेवक के दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को विज्ञापित करने में देश के लगभग एक हजार करोड़ को फूंक दिया गया.
अब बात तेलंगाना के मुख्यमंत्री के इस विज्ञापन की,
उत्तरप्रदेश में उनकी क्षेत्रीय, जातीय, भाषाई समझ शून्य होने के बावजूद अमरउजाला जैसे विशुद्ध हिन्दी प्रसार-क्षेत्र वाले अखबार में दिए गए चार पेज के विज्ञापन यह साबित करते हैं की गैर-भाजपाई सरकार वाले राज्यों को अपनी उपलब्धि बताने और जताने के लिए उत्तरप्रदेश के विशाल जन-मानस के समक्ष अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को दिखाने की बाध्यता और दबाव रहता है.
अर्थात, उत्तरप्रदेश की जनता देश में राजनीति करने वालों के लिए एक स्वीकृति प्रदान करने वाली प्रयोगशाला है.
कभी-कभी मैं यह भी सोंचता हूँ, की नए बने राज्य ‪#‎तेलंगाना‬ में पकाई जाने वाली खीर की मात्रा अधिक हो गयी है, जो पकाए जाने वाले बर्तन से बाहर गिर-गिरकर फ़ैल रही है, जिसे अखबार वाले लोग भर लाये हैं......
मेरा सवाल इन सभी राजनीतिक दलों और उनके मुख्यमंत्रियों और देश के प्रधानमन्त्री से है कि आम जनता की गाढ़ी कमाई को व्यक्तिगत उपलब्धि के प्रचार-प्रसार के लिए उड़ाया जाना कितना नैतिक और उपयुक्त है???
सिलेंडर की सब्सिडी को वापस करने की मुहिम से हुयी बचत से गरीब महिलाओं को गैस-कनेक्शन देने की पहल की मैंने तारीफ़ की थी किन्तु केवल अपनी वाह-वाही के लिए किये जाने वाले अपव्यय को रोकने के लिए प्रभावी नीतियाँ बनाने की महती आवश्यकता है, वरना देश में लाखों कालाहांडी, लातूर और बुंदेलखंड बनते जायेंगे और हम अपनी शुतुरमुर्गी नीति पर खुद ही तालियाँ पीटते रहेंगे.
आपातकाल के दौरान सूचना के सभी माध्यमों के सरकारीकरण के समय और नरसिंहराव सरकार का "चार कदम सूरज की और", अटल बिहारी सरकार का"इंडिया शाइनिंग अभियान", मनमोहन सिंह के अपनी उपलब्धियों के प्रचार अभियान और इन सभी अति महत्वाकांक्षी प्रचार-प्रसार अभियानों की पूर्णतः विफलता से भी सबक सीखना ही होगा.
मेरा कहना यह है कि हर उस सरकार को मुंह की खानी पड़ी है जिसने आत्म-मुग्धता में सरकारी धन को बर्बाद किया हो.




Thursday, May 26, 2016

साहब का "तोता"

................कलियुग में जम्बूद्वीप के भारतखंड में उत्तरप्रदेश नाम का एक राज्य था.
वंशवाद के विरोध में एक ही परिवार की प्रमुखता वाली समाजवादी सरकार का शासन था.
कलियुग के जिस काल की यह कहानी है, उस काल में कमजोर राजा के मजबूत सलाहकारों का युग था.
"बाबू" टाइप के अधिकारी ही असली राजा थे, जो साहब कहलाते थे.
उस राज्य में एक बंगाली प्रजाति का एक बादशाह जैसी शानोशौकत से जीने का शौकीन "बाबू" यानी साहब था.
सत्ता की ताकत में उसे आदमी को पहचानने में दिक्कत आने लगी थी.
उसने अपने घर और दफ्तर में आने-जाने वालों की फितरत को पहचानने के लिए एक "तोता" पाला.
"तोता" विशिष्ट गुण वाला था.
वो हर आने-जाने वाले को देखकर उसकी सबसे बड़ी खासियत के बारे में चिल्ला-चिल्लाकर साहब को सचेत कर देता था.
इससे उन्हें जागरूक रहने में मदद मिलती थी.
इस खामख्याली में उन्होंने आने-जाने वालों से रोत-टोक का बैरियर हटा दिया.
लोग आते और तोते से अपना सर्टिफिकेट जारी करवा लेते.
इस व्यवस्था में एक दिन एक समस्या खड़ी हो गयी.
साहब के लिए चाँद-तारे और सारे लाने की व्यवस्था करने वाले उनके तीन-चार ख़ास मातहतों ने उनके पास आने से मना कर दिया और फोन पर ही रोने लगे.
साहब के ज्यादा जोर देने पर उन्होंने बताया कि वो जैसे ही घर-दफ्तर आते हैं तोता चिल्लाता है- "देखो!!! दल्ला आया, दल्ला आया, ताजा-ताजा माल लाया!!!" ऐसे में वो अपनी बेइज्जती बर्दाश्त कैसे करें???
साहब ने उसका दर्द समझा और तोते को डांटा कि किसी को ऐसे नहीं कहते...
अब अगले दिन उनमें से एक भीमकाय शरीर का मातहत एक ताजा माल लेकर आया पर तोते ने फिर चिल्लाया-"दल्ला नहीं आया,दल्ला नहीं आया, पर ताजा मुलायम माल लाया!!!"
वो अन्दर जाकर साहब से रोया.
साहब को भी बहुत गुस्सा आया.
उन्होंने तोते को डांटा और कहा की तुम कुछ भी नहीं बोलेगे.
तोता आज्ञाकारी था, उसने साहब की बात पूरी तरह मान लेने का वायदा किया.
फिर अगले दिन वही मातहत आया.
गेट से अन्दर आया और मुड़कर तोते को देखा, पर आज तोता चुप था.
वो थोड़ा आगे बढ़ा..........फिर पीछे मुड़कर देखा पर तोता अभी भी चुप था............
साहब के दरवाजे के पास पहुंचता तब तक उसने एक बार फिर तोते को देखा.
तोता बोला, जा-जा, समझ तो तू गया ही है.


Wednesday, March 2, 2016

संसद में चिल्ल-पों

Posted On May 11, 2012 Tags :


 -अरविन्द त्रिपाठी
आज एक बार फिर संसद हंगामे के भेंट चढ गयी. इसकी वजह संसद के अंदर मल-मूत्र की बदबू ना थी, वरन दलित-सम्मान और दलित-वोट-बैंक पर अधिकाधिक काबिज होने के लिए राजनेताओं की ऎसी गतिविधि थी जिसे विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल लगाने का प्रारम्भ है. वजह एक “कार्टून” है. देश को धार्मिक आधार पर साफ़-साफ़ बाँट चुके राजनेताओं ने समाज को जातीय आधार पर खेमेबंद करने के लिए राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है. उक्त हंगामाखेज कार्टून ना तो मोहम्मद  साहब पर था और ना ही हिन्दू देवी-देवताओं का था. पांच साल पहले छपी कक्षा-11 में नागरिक शास्त्र विषय की पुस्तक में छपे इस कार्टून को प्रकाशित किया गया था.  जिसमें आजादी के बाद संविधान के निर्माण में ज्यादा समय लगने से नाराज नेहरू जी को हाथ में हंटर लिए और घोंघे पर सवार बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर को दिखाया गया है. बाबा साहब पहली बार निशाने पर नहीं थे. अरुण शौरी की “वर्शिपिंग फ़ाल्स गाड” पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद भी दलित सम्मान के प्रश्न पर देश-व्यापी हंगामा हुआ था.
दलित-सम्मान के बहाने इस बार निशाना बने “कार्टून” को महान कार्टूनिस्ट शंकर ने बनाया था. शंकर को देश में कार्टूनिंग का जनक माना जाता है. यह कार्टून आज़ादी के बाद के समय का बनाया हुआ है और पांच साल पहले पुस्तक में शामिल किया गया था.  उन्हें आजादी से पहले से इस काम के लिए जाना जाता रहा है. लार्ड विलिंगटन और नेहरू जी सहित तमाम राजनीतिक और प्रबुद्ध भारतीय और विदेशी उनके कार्टूनों के मुरीद रहे हैं. उन्हें इन्हीं आड़ी-तिरछी रेखाओं के माध्यम से अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने वाले शंकर को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. कार्टून के बनाए जाने के समय और पुस्तक में प्रकाशित किये जाने के समय से अब तक कभी विरोध नहीं किया गया था. अचानक इस विरोध की वजह क्या हो सकती है ???
अभी हाल में कानपुर के “हेलो कानपुर” जैसे तीखे तेवर वाले साप्ताहिक समाचार-पत्र से कार्टूनिंग के कैरियर की शुरुआत करने वाले युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने “कार्टून्स अगेंस्ट करप्शन” साईट के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी अलख जगाई थी. जिसे संसद की अवहेलना मानकर राष्ट्रद्रोह सहित तमाम मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है. उसे हाल में देश में सर्वश्रेष्ठ आंदोलनकारी कार्टूनिस्ट माना जा रहा है. उसे बड़े-बड़े पत्रकारों में नाम और स्थान मिल रहा है. उसने फेसबुक और गूगल पर सरकारी नियंत्रण के संभावित दुष्चक्र के विरुद्ध आंदोलन चला रखा है…………………सवाल ये है, सरकार विचार कर रही है, विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमाओं में बाँधने का बहाना क्या हो ?? बाबा साहब के सम्मान में ठेस के बहाने हंगामे की भेंट चढी संसद में उत्तर प्रदेश में हाल में बेरोजगार हुईं बहन मायावती को एक बार फिर मीडिया की सुर्खियाँ मिल सकीं. कपिल सिब्बल का माफी प्रकरण और लालू का कार्टून को लोकतंत्र पर हमला बताए जाने की ख़बरों के बीच योगेन्द्र यादव और सुहास पाल्सीकर का इस्तीफा लोकतंत्र के चौथे खम्भे की नींव पर प्रहार सा लगता है. ………………..सवाल ये है, सरकार विचार कर रही है, विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमाओं में बाँधने का बहाना क्या हो ?? लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के आरोपों से घिरे शंकर और असीम त्रिवेदी के कामों को नकारने का ये कौन सा तरीका है ????
क्या कार्टूनिंग की विधा को पत्रकारिता जैसा सम्मान नहीं दिया जाएगा ????? आड़ी-तिरछी लाइनों के माध्यम से देश-दुनिया के राजनीतिक और सामाजिक ज्वलंत मुद्दों पर चुटीली प्रस्तुति देश की भावी पीढ़ी के व्यक्तित्व विकास में अति आवश्यक विधा राजनीतिक नियंत्रण से बचाने की आवश्यकता है.
जब लिखना और दिखना हो......
....अरसे बाद फिर से ब्लॉग-मंच पर उपस्थित हुआ हूँ.
वजह साफ़ है की जब विचारों की धारा सूख गयी सी लगती हो तो नया कुछ भी उत्पन्न नहीं हो पाता.
मन पर यह व्यामोह भी हावी होता है की किसे और कितना लिखा जाए ????
फिर भी अवचेतन मन में चलनी वाली वैचारिक आंधियां कुछ बेहतरी की दिशा में काम करती ही रहती हैं.
चलिए, फिर से एक नयी शुरुआत हो........
साफ़ मन और मष्तिष्क के साथ.......

Thursday, August 2, 2012

......लो खुल गयी....मुट्ठी !!


......लो खुल गयी....मुट्ठी !!
     अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले सोलह महीने के जन-लोकपाल की मांग के आंदोलन के कई चरण देश ने देखे हैं. परन्तु पिछले साल के रामलीला मैदान के हाउसफुल और मुम्बई के एम.सी.आर.डी. ग्राउंड के सुपर फ्लॉप से होते हुए जंतर-मंतर मैदान तक टीम अन्ना के आंदोलन के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया. आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी का सफल तरीका, “अनशन” अन्ना हजारे के नेतृत्व में चली भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम को ताकत देने का हथियार बन कर उभरा. देश के राजनेताओं के तमाम आरोपों और आक्षेपों को सहते हुए इस टीम ने अपने लक्ष्य यानी जन-लोकपाल कानून की मांग के प्रति समर्पण तो जाहिर कर दिया है पर उसे लागू करवा पाने के लिए अपनाया गया रास्ता अभी भी बहुत धुंधला और पथरीला है. टीम अन्ना के द्वारा ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का नारा लगाते-लगाते ‘सत्ता-परिवर्तन’ और सत्ता को अपने हाथ में लेने का निर्णय एक अंधी सुरंग में प्रवेश कर जाने जैसा  आभास देता है, जहां से लक्ष्य के और दूर होते जाने की संभावना बढ़ती जाती है. सरकार और दूसरे राजनीतिक दल इस पूरी टीम को इसी चुनावी जाल में फंसाने में सफल रहे क्योंकि इस टीम के सवाल सभी दलों को घेरे में ले रहे थे. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के कद के राजनेता ने भी नए राजनीतिक दल का निर्माण कर सत्ता में अपने जिन शिष्यों को बिठाया वो भी उसी राजनीतिक अपसंस्कृति का शिकार हुए थे. ऐसे में अन्ना हजारे के समक्ष उनके शिष्यों के राजनीतिक दल बनाने के बाद राजनीतिक शुचिता बनाए रखने चुनौती और बढ़ जाती है. दूसरी तरफ डी-एस-4 जैसे आंदोलन से शुरू होकर बहुजन समाज पार्टी का विकास, आंदोलन से राजनीतिक दल पैदा हो सकने का प्रमाण भी हैं.
अन्ना हजारे के द्वारा राजनीतिक दल बनाने और राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने की घोषणा से राजनीतिक दलों और राजनेताओं के प्रति क्षोभ और हताशा का चरम साफ़-साफ़ जाना और समझा जा सकता है. अब ऐसा लगता है 42 बरस से संसद के चौखट पर लुंज-पुंज पड़े लोकपाल को सशक्त क़ानून में तब्दील करने के लिए टीम अन्ना ने देश की समूची राजनीति के खिलाफ ताल ठोंक दी है. इसकी वजह ये है कि संसद की मंशा के प्रति इनकी स्पष्ट राय है कि ये राजनीतिक लोग और ये राजनीतिक दल न तो कारगर लोकपाल लाने वाले हैं और न ही भ्रष्टाचार को मिटाने की पहल में साथ देने वाले हैं. लेकिन राजनीतिक तौर-तरीकों  पर सवाल खड़े करने की जल्दी में इस टीम ने तमामों गलतियां की हैं. इस पूरे आंदोलन में ‘हिसार-कांड’ वो टापू बनकर उभरा, जब इस टीम की राजनीतिक समझ बहुत अपरिपक्व साबित हुई. अब अन्ना सहित इस पूरी टीम की इसी ‘राजनीतिक समझ’ की वास्तविक परीक्षा का समय आ गया है. इस आंदोलन के प्रारम्भ में जुड़े तमाम नामचीन लोग ‘कोर कमेटी’ से ‘आतंरिक-लोकतंत्र’ ना होने का आरोप लगाकर  किनारा कर चुके हैं. ऐसे में जन-लोकपाल की मांग के लिए विदेशी धन से पोषित समाजसेवी संस्थाओं के संरक्षण के आरोपों वाले आंदोलन से ऊपर उठकर राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कहीं आत्मघाती साबित न हो. 2014 के आम चुनावों तक जातीय, सांप्रदायिक, भाषाई और क्षेत्रीय आधार पर बनते देश भर के मतदाता के समक्ष अपनी बात पहुंचाना बहुत कठिन काम है.
टीम अन्ना के द्वारा इस राजनीतिक दल के निर्माण के निर्णय की हड़बड़ी का कारण ये भी है की सरकार ने इस बार पूरे आंदोलन को खास तवज्जो नहीं दिया. प्रणव मुखर्जी सहित उन्नीस केन्द्रीय मंत्रियों को हटाने और उनपर मुकदमा करने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर शुरू किये गए अनशन में गत वर्ष के आंदोलन जैसी धार नहीं थी. अन्ना हजारे के खुद अनशन में उतरने के बाद आयी गति ने भी वो जन-सैलाब नहीं पैदा किया जो विगत वर्ष के राम-लीला मैदान के आंदोलन के समय उत्पन्न हुआ था. वास्तव में टीम अन्ना की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी, अब तक के आंदोलन में उमड़ी भीड़ का कृत्रिम मूल्यांकन. इस टीम को यह भ्रम हो गया था की जब भी वे तख़्त बिछा देंगे, जहां भी माइक लगा देंगे, सारा देश अपना काम-धाम छोड़कर मोमबत्ती जलाने लगेगा. लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था की मोमबत्तियों से शुरू हुआ आंदोलन मशाल बनकर जब धधका तब आग कहाँ से आई ? ये इसे कैंडल के पैकटों की देन समझते रहे, जबकि लोगों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना की आवाज में सारे राजनीतिक और संगठनात्मक बंधन को ध्वस्त कर आमूल-चूल परिवर्तन की आशा में एक नयी मशाल जलाई थी. देश के मध्य वर्ग और खासकर युवा वर्ग ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन टीम अन्ना ने इस भीड़ को मदारी के डमरू पर इकट्ठा हुए तमाशबीनों के अलावा और कुछ नहीं समझा, साथ ही उन्हें अपने इस डमरू पर इस कदर विश्वास हो गया की मानो वही एकमात्र कुशल मदारी हों. सरकार और राजनीतिक दलों में प्रमुख पदों पर बैठे लोगों की चालों और जनता की समझ पर उन्होंने कोई रणनीति नहीं बनायी थी. अब अन्ना हजारे के सामने सवाल था, इस बार के नौ दिन के अनशन को घोषित रूप से असफलता को स्वीकारने के बजाय उससे शेष ऊर्जा को बचाकर आंदोलन के आगे के चरणों के लिए संघर्ष जारी रखने के लिए यह जरूरी हो गया था की कोई भविष्य का कार्यक्रम घोषित किया जाता.
अब देश भर में इस टीम अन्ना के उद्देश्यों के सन्दर्भ में सवालों के घेरे गढे जाने शुरू हो चुके हैं. अन्ना की ये नवगठित पार्टी किस विचारधारा की राजनीति करेगी, पार्टी चलने के लिए धन कहाँ से आयेगा, धन क्या कार्पोरेट सेक्टर से लिया जाएगा, पार्टी का संगठन कैसे तैयार किया जाएगा, चुनाव लड़ने लायक ईमानदार प्रत्याशियों का चयन कैसे किया जायेगा, पार्टी की जीत का आधार क्या होगा, पार्टी सरकार न बना पाने की स्थिति में गठ-बंधन की राजनीति करेगी या नहीं, शराब और रुपयों का वितरण करके चुनाव जीत लेने वाले बाहुबली और अपराधियों के सामने पार्टी की क्या रणनीति होगी, पार्टी का ग्रामीण भारत में क्या पैंतरा होगा और सबसे बढ़कर सवाल यह है की इस पार्टी के लड़ने से किस पार्टी को सबसे ज्यादा लाभ या हानि होगी ?  ऐसे समय में जब देश की जनता सत्तासीन कांग्रेसनीत गठबंधन की सरकार के घोटालों और भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी है और देश भर में इस सरकार के विरोध में जन-मानस तैयार हो चुका है इस नए राजनीतिक दल के निर्माण का निर्णय और उसके परिणाम भविष्य के गर्भ में छुपे हैं परन्तु इतना अवश्य है की सरकार इस जन-लोकपाल के आंदोलन को बिना शक्ति-प्रयोग करे ही दिशा-हीन करने में सफल रही. साथ ही बाबा रामदेव के नौ अगस्त के आंदोलन के प्रति भी स्पष्ट संकेत देने में पूरी तरह सफल रही की उसपर भ्रष्टाचार विरोधी ऐसे आन्दोलनों का कोई असर नहीं पड़ता है, जबकि यह समय इस सरकार का सबसे नाजुक आत्मविश्वास का है.
                                              अरविन्द त्रिपाठी, कानपुर                                           
                                                  09616917455

Saturday, July 21, 2012

भू-जल दिवस के सन्दर्भ में कैनविज़ टाइम्स में २० जुलाई को प्रकाशित लेख

































पानी रहेगा तो जिंदगी रहेगी

     यह हकीकत है कि उत्तर प्रदेश के शासन ने भूजल संरक्षण के लिए कागजों पर बहुत कुछ किया है। लेकिन समाज के साथ मिलकर उन्हें जमीन पर उतारने का काम अभी बहुत बाकी है। काश! हर बरस आने वाले भू-गर्भ जल दिवस पर हम प्रदेशवासी भी जाग जाते। काश! इसे हम महज एक आयोजन न मानकर संकल्प, समीक्षा और भू-गर्भ जल संरक्षण आदेशों व सुन्दर काम के सम्मान का मौका बना पाते। माइक संभालने की बजाय फावड़ा उठा पाते। किंतु यह हो नहीं पा रहा।
         जानने की बात है कि उत्तर प्रदेश देश का पहला प्रदेश है, जिसने मनरेगा के तहत तालाबों के नाम पर बन रही चारदीवारियों की बड़ी बेवकूफी सुधारकर उसे पानी आने के रास्ते की तरफ से पूरा खुला रखने का आदेश जारी किया। मनरेगा तालाबों के लिए जगह के चुनाव में समझदारी भरे निर्णयों का होना अभी बाकी है।

           उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के राजस्व परिषद द्वारा जारी चारागाह, चकरोड, पहाड़,पठार व जल संरचनाओं की भूमि को किसी भी अन्य उपयोग हेतु प्रस्तावित करने पर रोक लगाने, अन्य उपयोग हेतु पूर्व में किए गये पट्टे-अधिग्रहण रद्द करने, निर्माण ध्वस्त करने तथा संरचना को मूल स्वरूप में लाने को प्रशासन की जिम्मेदारी बताने वाली अधिसूचना भी एक मिसाल ही है। शासन के दोहराये निर्देशों और अदालतों द्वारा बार-बार तलब किए जाने के बावजूद चुनौतियों से दूर ही रहने की प्रवृति और इच्छाशक्ति के अभाव ने शासन द्वारा उठाये ऐसे ऐतिहासिक कदम को भी कारगर नहीं होने दिया। इसका ठीकरा सिर्फ सरकार के सिर फोड़कर बचा नहीं जा सकता; समाज भी उतना ही दोषी है।

        यूं तो हर वर्ष 10 जून को भू-गर्भ जल दिवस मनाकर जनभागीदारी सुनिश्चित करने का शासनादेश है। किंतु क्या भू-गर्भ जल दिवस महज एक दिखावटी आयोजन भर होकर नहीं रह गया है? इस वर्ष तो प्रदेश सरकार ने हद ही कर दी। यह स्थिति तब पैदा हुयी जबकि प्रदेश में किसान और मजदूरों कि हित–रक्षक समाजवादी पार्टी के उस युवा मुख्यमंत्री के हाथों में कमान है जो पर्यावरण इंजीनियरिंग में उच्च शिक्षा  प्राप्त है। 20 जुलाई को होने वाले आयोजन और 16 से 22 जुलाई तक चलने वाले एक सप्ताह के सेमीनार, रैली सहित तमाम जागरूकता के अभियान महज दिखावटी और अनुपयोगी इस लिए साबित हो रहे हैं क्यों कि किसान इस समय इस सब को सुनने की फुर्सत में नहीं है. उसे अपने खेत और अपने परिवार के पेट कि फ़िक्र है. बाकी जनता को किसी तरह से पानी का मतलब सिखाना बेमानी है क्योंकि भू-गर्भ जल की वास्तविक जरूरत किसान और अशिक्षित मजदूर को ज्यादा है. विधायकों और सांसदों के पास यही वर्ग सबसे ज्यादा पेयजल के लिए हैंड-पम्पों और सिंचाई के लिए जल-आपूर्ति हेतु ट्यूब-वेळ की याचना करता मिलता है. अमीर तबका अपनी जरूरत धन के माध्यम से पूरी कर लेता है.
 
    उत्तर प्रदेश के भूगर्भ जल विभाग ने पिछले कई सालों में कई गर्व करने लायक शासनादेश भी जारी किए। किंतु यह उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि उनके पालन के नाम पर गौरव लायक उसके पास कुछ भी नहीं है। हकीकत यह है कि अगर भूजल संरक्षण संबंधी उक्तशासकीय निर्देशों को मानने की समझदारी उत्तर प्रदेश के प्रशासन व समाज दोनों ने दिखाई होती, तो सच मानिए कि उत्तर प्रदेश के पानी और धरती दोनों का चेहरा बदल गया होता। धरती पर डराती सूखी लकीरे, हरे से भूरा होता भूगोल और बेपानी कटोरे न होते। नतीजा दुखद है कि पूरे उत्तर प्रदेश का पानी उतर रहा है।

       पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण उत्तर प्रदेश के हर इलाके में संकट की आहट साफ सुनाई दे रही है। बुंदेलखंड मे फिर आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया है।’’ कहीं रोटियां कम पड़ गई हैं पेट भरने के लिए। कहीं अनाज इतना हैं कि बोरे कम पड़ गये हैं संजोकर रखने के लिए।’’ यह कैसा विरोधाभास है! रोटी की कमी और बिन ब्याहे बेटी को घर बिठाकर रखने की बेबसी मौत का सबब बन रही है। पेड़ कटान और अनियंत्रित खदान है कि कोई रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। सरकार के पास लड़की, जवान, बूढ़ा सभी को काम देने की दुनिया भर की योजनायें हैं। कौशल उन्नयन की राष्ट्रीय परिषद है। ग्रामीण और कुटीर उद्योगों के लिए खादी ग्रामोद्योग है, लेकिन बुंदेलखंड को मौत की बेबसी से उबारने के लिए क्या कुछ भी नहीं? पैकेज का पैसा भी लालच और नादानी के पानी में व्यर्थ ही बह रहा है।
       खैर! निर्णयों की ऐसी बेसमझी, हावी ठेकेदारी, विभागों के बीच तालमेल का अभाव, समग्र सोच और हर काम के लिए सरकार की ओर ताकने की लाचारी बदस्तूर जारी रही, तो फिर भूजल दिवस दिखावटी होकर रह जायेंगे और उत्तर प्रदेश सब कुछ होते हुए भी बेपानी। आखिर क्या नहीं है उ.प्र. के पास? अच्छा वर्षा औसत, गहरे एक्यूफर, तालाबों की बड़ी सूची, नदियों का विशाल संजाल, बागवानी और वानिकी की अकूत संभावनायें, क्रियान्वयन के लिए पहले से मौजूद केंद्र और राज्य स्तरीय योजनायें और बजट भी। सभी कुछ तो है। यूं भी आपात स्थितियां बजट और योजना देखकर नहीं आती। प्रदेश में तेजी से उतरता भूजल प्रमाण है कि भूजल के मामले में यह आपात स्थिति ही है। सरकार और आम-जनता को यह संकट साफ़-साफ़ महसूस कर लेना चाहिए.

       अतः समाज को भी चाहिए कि वह इस आपात स्थिति से निबटने के लिए किसी योजना और बजट का इंतजार न करे। उठाये फावड़ा-कुदाल और टोकरे। जुट जाये बारिश से पहले पानी के कटोरों को साफ करने में। पालों को पक्का करने में। ताकि अब जब भी बारिश की अगली ‘पहली फुहार’ आये, तो ये कटोरे प्यासे न रह जायें। हम इनकी प्यास का इंतजाम करें। हमारी प्यास का इंतजाम ये खुद बखुद कर देंगे। जरूरत है कि अच्छे आदेशों का पालन सुनिश्चित की जाये। हम खुद तय करें कि सामान्य और आपात स्थितियों में एक तय गहराई से नीचे पानी न निकालना है, न किसी को निकालने देना है। बस! फिर देखियेगा कि बारिश की हर बूंद संजोना एक दिन कैसे खुद-ब-खुद आवश्यक हो जायेगा। भूजल दिवस मनाना सफल हो जायेगा। क्या इस भूजल दिवस पर है कोई, जो इस पहल का पहरुआ बनकर आगे आये? या फिर सरकारी आयोजन की श्रंखलाओं में से एक यह भी बन जायेगा और आम जन-मानस इससे पूरी तरह अछूता रहकर इसे दूरी बनाकर अपने भविष्य को बर्बाद करता रहेगा.
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खाली होने से पहले बचा लो
भारत की नदियों में बहने वाला सतही जल का अधो-भूजल के साथ गहरा रिश्ता रखता है. अधो-भूजल के  भण्डार जब खाली होते हैं तो नदियों की सतह पर बहने वाले जल का दर्शन नहीं होता.नदियाँ  अधो-भूजल भण्डार भरने पर छोटे-छोटे झरनों से निकलने वाली जल धाराओं  से निर्मित होती है. गंगा, यमुना, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि  सभी  नदियों में अब जहां अधो-भूजल का प्रवाह है, वहीँ वह नदी बची है. अन्यथा देश भर की सभी नदियाँ नाला बन गयी हैं या जल के प्रवाह के बिना सूखकर मर गयी हैं. हमारी सरकारों ने प्राकृतिक रूप से नदियों में मिलने वाले पर्यावरणीय प्रवाह में सीवेज और कल-कारखानों का अपशिष्ट मिलाने में कोई हिचक नहीं दिखाई है. जिसका परिणाम घातक साबित हो रहा है.
         अब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारत में बहुत सी छोटी नदियाँ सूखकर मिट गयी हैं या फिर मिटा दी गयी हैं. उनके प्रवाह स्थल पर खेती, उद्योग और आवास अब जगह-जगह बनते जा रहे हैं. नदियों के मरने, मारने और सूखने की घटनाओं से अब भारतीय समाज और सरकारें चिंतित नहीं दिखती हैं. एक ज़माना था जब नदियों के प्रवाह को देखकर समाज उसके संरक्षण के सपने संजोता था. जहर और अमृत की धाराओं को अलग-अलग रखने की विधियां सोचकर उन्हें सम्हालकर रखता था. आजकल हममें अमृत-वाहिनी  नदियों में मैला और जहर मिलाने की हिचक तक मिट गयी है. अब नदियों में मैला  और जहर मिलाने वाले शहरी लोग और सरकारें बड़े बन गए हैं. अब इस कूड़ा और सीवेज प्रबंधन के नाम पर बहुत सारी विदशी आर्थिक ताकतें चोर दरवाजे से हमारे घरों में प्रवेश कर रही हैं. आज यह बढ़ता कूड़ा भी विदेशी उपभोगवादी संस्कृति के निरंतर बढ़ावा देने का परिणाम है जो आर्थिक उदारीकरण अपनाने का दुष्परिणाम है.
ऐसे समाज में जो "नीर, नारी और नदी"  का सम्मान करके दुनिया का गुरू बना हुआ था, उसे हमारे आधुनिक उदारीकरण व बाजारीकरण वाली सभ्यता ने समेट कर संहार कर दिया है. ऐसा लगता है की आज की सभ्यता भारतीय नदी संस्कृति को लील चुकी है. इसीलिए अब हम नदियों को नाला बनाने वाला हिंसक और भ्रष्टाचारी रास्ता अपना रहे हैं. इस रास्ते पर अब हमें आगे बढ़ने के बजाय भारतीय संस्कृति की सम्मान देने वाली नीर, नारी और नदी को पुनः-जीवित करने की जिजीविषा जुटानी पड़ेगी.
    उत्तर प्रदेश गंगा-जमुनी संस्कृति का जनक रहा है. इस राज्य को अपनी नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह  सुनिश्चित करने हेतु नदी भूमि का अतिक्रमण रोकना तथा प्रदूषण करने वाले नालों को नदी से दूर मोड़ना आवश्यक है.आज हमें नदियों के प्रवाह को बढ़ाने हेतु वर्षा जल सहेजकर वर्षा ऋतु में बहते जल को धरती के पेट में डालने का काम करना चाहिए. प्राकृतिक जल श्रोत जैसे तालाब, झीलों और पोखरों का प्रबंधन सही तरीके से करना होगा. मनरेगा की योजना के आने के बाद इन सभी जल-निधियों को संरक्षित करने के लिए धन की कमी नहीं रही है. बस जरूरत मन की है. इन भू-आकृतियों के माध्यम से पानी से भरा धरती का पेट लम्बे समय तक पानीदार बना रहेगा क्योंकि सूरज की किरणें भूजल की चोरी नहीं करती हैं और वाष्पीकरण नहीं होता. बल्कि भूजल से भरे हुए भंडारों का दबाव नदियों के प्रवाह में ऊर्जा पैदा करता है. यह ऊर्जा जब समुद्र में मिलती है तो समुद्र की ऊर्जा से नदी का जल-स्तर ऊपर आ जाता है. समुद्र की ऊर्जा व नदी के भूजल की ऊर्जा का योग नदी को प्राकृतिक बनाकर देता है. समुद्र और  नदी का करंट (ऊर्जा) मौसम का मिज़ाज़ ठीक करने व धरती का बुखार उतारने में भी मदद करता है.
     उत्तर प्रदेश की नदियों के प्रवाह को बनाकर रखने में नदियों के प्रवाह क्षेत्र में मोती रेत की गहरी तह बड़े स्पंज का काम करती थीं, लेकिन  नदियों में हो रहे खनन, उद्योग , खेती सभी कुछ भूजल के भंडारों का शोषण करने में जुटे हैं, जब भूजल के भण्डार शोषित हो जाते हैं तो अधो भूजल के करंट (ऊर्जा) मर जाते हैं. और नदी का यह रेत जो स्पंज की भूमिका निभाता था , वह भी अब नष्ट हो गया है. नदियों के भूजल के भंडारों का खाली होना  उत्तरप्रदेश की खेती और उद्योगों पर तो बुरा असर डालेगा ही साथ ही साथ यहाँ के समाज की  सेहत को भी बिगाड़ेगा.  नदियों के मरने और सूखने से भारत के मानव समाज की आर्थिकी और सेहत दोनों बिगड़ जायेगी. दुनिया के बाज़ार की  गिरावट हमें नदियों और खेती के कारण ही नहीं गिरा सकी थीं. लेकित जब नदियाँ बीमार होंगी तो हम भी बीमार होने से नहीं बच सकेंगे. इलाज में हमारी  आर्थिकी  बिगड़ेगी और हमारे काम छूटेंगे  . हमारे विकास की गति भोथरी हो जायेगी. हम उलटा सैकड़ा,  दहाई और इकाई पर आकर खड़े हो जाएंगे.
    नदियों का पर्यावरणीय प्रवाह ही हमारे जीवन के प्रवाह को बनाकर रखता है. हमारी जीविका, जीवन और जमीन भूजल के भण्डार और नदी के प्रवाह से जुड़े हैं. हमें अब नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करने वाली नदी नीति चाहिए. भूजल का भण्डार भूजल पुनर्भरण और नदियों के प्रवाह को बढाने वाला जल-संरक्षण का संस्कार तथा नदी के साथ सद्व्यवहार चाहिए.
     साथ ही साथ भूजल शोषण को रोकने वाला अधिनियम तथा मर्यादित जल उपयोग को व्यवहार में लाने वाला सामुदायिक दस्तूर चाहिए. भूजल पर अपनी आश्रितता में कमी लानी होगी. यह तभी होगा जब हम अपनी नदियों को साफ़-सुथरा बनाए रखें. उसमें मानवीय और औद्योगिक अपशिष्ट मिलाने से परहेज करें. तभी हमारी नदियाँ मरने से बचेंगी. भूजल के भण्डार बचेंगे और हमारा जीवन समृद्ध होगा.



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