Friday, April 22, 2011

मीडिया के दम पर भ्रष्टाचार से लड़ने में मारे गए गुलफाम

          देश-भर में चलने वाले भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे के आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और यश लूटने के लिए कानपुर के समाजसेविओं में भी होड़ चल रही है.वो चुके नहीं हैं ये बताने और जताने के लिए तरह-तरह के उपक्रम और उपाय किये जाते रहते हैंकभी  फटेहाल और आज मालामाल हो चुके इनके साथ अब जनता नहीं रही है. ये बात उनकी समझ में  चुकी है.कुछ कालेज के छात्रों को साथ लेकर आन्दोलन चलाकर असफल हो चुके इन समाजसेविओं ने अब नया फंडा निकाला है. या यूं कहो की अब "सभी,सभी के लिए" के सूत्र को जान-समझ लिया है.अब ऐसे  सभी दगे हुए कारतूसों ने एक बार फिर सक्रियता बढानी शुरू कर दी हैये काम अन्ना हजारे  के आन्दोलन शुरू करने के साथ की गयी है. कारण साफ़ था की  "कानपुर रत्न" जैसे सम्मानों से अलंकृत होने और करने वाले इन सभी को ये लग रहा था की क्या हम इस बार के आन्दोलन में पीछे रह जायेंगे ? इस बात को सभी जानते थे की शायद हम जन-समर्थन से दूर हो चुके हुए "चुके हुए लोग" हैं. अतः एक सभा कर के  एक आम सहमति बनायीं गयीजिसमें शहर भर के भवेशिओं   ने समाजसेवी होने के नाम पर भाग लिया. पांच अप्रैल को गांधी प्रतिमा के नीचे अन्ना हजारे के समर्थन में बैठने के लिए उनको भी आमंत्रित किया गया जो अब धरना देने के लिए और धरना देने के लिए यानी दोनों कामों के लिए धरा लेते या फिर धरा  लेती हैं. अरे भाईधन धरा लेते/लेती हैं. यदि इन सभी की विगत के वर्षों की संपत्ति की जांच कराई जाए तो बहुत कुछ साफ़ और खुलकर सामने जाएगा

                     उस पांच अप्रैल के धरने में एक और नाम था. अशोक जैन का. इंडिया अगेंस्ट करप्शन आन्दोलन के  के संयोजक हैं. ये भी कानपुर की मुख्य  धारा के व्यक्ति हैं.  छोटेभाई नरोनारामकिशोर बाजपेयी, जगदम्बा भाई, राम कृष्ण तैलंग , मनोज कपूर , सुमन मिश्र जैसे लब्ध-प्रतिष्ठ  कानपुर के  अन्य वरिष्ठों के हम राही और समकालीनइस बार इन्हें अकेले करते हुए इसी टीम की जूनियर टीम के नेताओं ने इनसे इनका अधिकार और दायित्व छीनते हुए आन्दोलन को अपने हाथ में लेने का पूरा सफल प्रयास लिया. मौन रहने वाले धरने में खूब नेतागिरी की बातें हुयीं.खूब भाषण किये गएपत्रकारों से मुफीद संबंधों के दम पर अच्छी -अच्छी फोटो खिंचवाई गयी. उन सभी को मालूम  था की कहाँ पर बैठने से बहुत अच्छी फोटो आती है और कहाँ और किस फोटोग्राफर को कैसे सेट किया जाए की हमारी ही फोटो छपे .पत्रकारों को प्रेस विज्ञप्ति के साथ   समाजसेविओं और समाज सेवी संगठनों  की सूची दी गयी तो पता चला की लोग 35  और संगठन 40  थे. अब आज तक ये चख-चख है की ऐसे कौन से लोग थे जो दो-दो संगठनों के संचालक थे. आम जनता से आने वाले  लोग तो गांधी के चरणों के नीचे भी नहीं बैठ पाए.ऐसे में इस छद्म समाजसेविओं  गिरोह से अशोक जैन कैसे बच और छप सकते थे. वे  बेचारे अपने अस्तित्व के बारे में ही बताते रहे.खैर, अन्ना हजारे की ही तरह से उनकी सिविल सोसाइटी में भी उनके ही ख़ास परिवारी लोग ही  विशिष्टजन हैं.कमजोर व्यक्ति सदैव अपने घर,परिवार,रिश्तेदार  और यारों से ही शुरू भी तो करता हैउन्होंने इस तोहमत के बारे में स्पष्ट किया की ऐसा नहीं था मैंने सभी प्रमुख समाजसेविओं को अपने साथ मिलजुलकर आन्दोलन में सहभागी बनाने का भरसक प्रयास किया . सबसे बड़ी बात ये की मेरे सभी पुत्र अपने व्यवसाय में संतुष्ट हैं और 75  से अधिक की आयु में मेरी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं रही. अतः सारे आरोप कुछ विशिष्ट जनो के द्वारा लगाए और बनाए गए हैं जिनका कोई आधार नहीं है.  इसी तरह से कानपुर में एक नयी सनसनी बनी सबा को तो मंच पर जगह ही नहीं मिल सकी थीखुद भी एक साथ दो कालेजों में शिक्षण करके आय के भ्रष्ट तरीके को अपनाने वाली ये लड़की भ्रष्टाचार से लड़ने वाली नयी लड़ाका के रूप में सामने आई है.अभी ये स्पष्ट होना बाकी है की इसकी वास्तविक मंशा क्या है.भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने का कोई पुराना अनुभव और कोई वाकया हुए बिना उन्हें सिर्फ मीडिया का बनाया नेता मान लेना बेवकूफी नहीं है. कानपुर में ऐसे तमामों समाजसेवी हैं जो सिर्फ मीडिया में अपने बेहतर संपर्कों के दम पर जीवित हैं.   

              मुझसे किसी ने   इस पूरे धरने की समीक्षा करने को कहा तो मैंने कहा की आज के इसी धरने में शहर को एक नयी नीलम चतुर्वेदी, एक नया संजीवा, एक नया रामजी त्रिपाठी, एक नया कमलकांत  तिवारी और एक नया ....................मिलेगा.ऐसा था की मुझे इस धरने में नजरअंदाज ही किया गयाधरने के मध्य ही  मुझसे दीपक मालवीय ने कहा की सभा का  पोस्टमार्टम मत करो और मंच पर साथ में बैठो,   तो मेरे मना करने पर कानपुर के अज्ञात युवा साथी ने कहा की मंच पर लाशें इकठा होंगी, तो पोस्टमार्टम तो होना ही है.
           अन्ना के आन्दोलन को नया और अपने एक पुराने आन्दोलन "घूस को घूँसा" को अत्यधिक सफल और सशक्त बताने वाले लोगों ने इसे फिर से शुरू करने का काम 20 अप्रैल से शुरू किया. कभी इस आन्दोलन के साथ आम जन मानस हुआ करता था. पर आज सभी को मालूम हो चुका है की आज इस आन्दोलन के आन्दोलनकारी इसी आन्दोलन कारिता के दम पर सभी आफिसों में काम कराने के तयशुदा माध्यम बन चुके हैं. इस आन्दोलन के शीर्ष नेतृत्व  को जैसे ही  इस गड़बड़ का पता चला तो उन्होंने इससे अपना पल्ला झाड़ लिया था और कानपुर में दीपक मालवीय सहित विद्वत समाजसेविओं ने अपने को अलग कर लिया था. ये कार्यक्रम नितांत सच्चा और सफल था. परन्तु बहुत जल्दी उसी बीमारी से ग्रस्त हो गया जिसके खिलाफ चल रहा था. दुर्भाग्य से ये दीर्घजीवी हो सका.जैसा की अपने भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात प्रदेश सरकार के आर. टी. . दफ्तर में व्याप्त दलाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ कल से धरना दिया गया था.इस आन्दोलन में पूरे साठ लाख के शहर के 6,00 लोग भी इसमें शामिल हो सके.सद्भावना परिवार और चित्रांशी परिवार के कार्यकर्ताओं की कानपुर के दबंग और भ्रष्ट आर.टी.. निर्मल प्रसाद ने पिटाई करवा दी.कारण स्पष्ट था , दलाली पर डाका का भय . काम ठीक था पर यदि यही काम अन्य समाजसेविओं को उसी तरह से साथ लेकर किया गया होता जैसा की पांच अप्रैल के धरने में हुआ था तो भ्रष्टाचारी की ऎसी हिम्मत नहीं पड़ती. पर डर ये था की कहीं भ्रष्टाचार से लड़ने का कापीराईट   छिन जाए.सशक्त माफिया और दबंग भ्रष्टाचारी से लड़ने के लिए सदैव जन-बल और मजबूत इच्छा-शक्ति की आवश्यकता होती है.यद्यपि ऎसी ख़बरें मीडिया में सुर्खियाँ तो बन सकती हैं, परन्तु दीर्घगामी परिणामों के लिए बहुत सोची-समझी रण-नीति की आवश्यकता होती है.जो कल की घटना से स्पष्ट हो जाता हैप्रदेश और केंद्र की सरकारों के इशारों पर चलने वाले इस भ्रष्टाचार के उपक्रम से लड़ने का तरीका अति परिष्कृत और उन्नत होना चाहिए था.यदि यही कार्यक्रम देश-भर में सर्व-मान्य  इंडिया अगेंस्ट करप्शन या फिर कानपुर के किसी चर्चित बैनर जैसे लोक सेवक  मंडल जैसे बैनर के साथ होता तो संभव है की ऐसा कर पाना भ्रष्टाचारी अधिकारी और उसके दलालों सहित गुंडों के लिए गले में फांस बन जाता.

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