Wednesday, January 26, 2011

कानपुर से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक नए संग्राम का शुभारंभ..........

जैसा की सारी दुनिया जानती है, कानपुर देश में नया चलन शुरू करने के लिए जाना जाता रहा है. गांधी और भगतसिंह दोनों के आन्दोलनों का गर्भगृह रहा कानपुर इसके पूर्व में प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के लिए भी साक्षी बना था. यद्यपि इसकी शुरुआत मेरठ से अवश्य हुयी परन्तु कानपुर में इस टिमटिमाती लौ ने ज्वाला का रूप अख्तियार कर लिया.गांधी के कानपुर आगमन के बाद ...आजादी के लिए लड़ने वालों को नयी ऊर्जा मिली. कानपुर की उर्वरा भूमि सदा से आदोलनों के लिए जनि गयी है. आजादी के बाद चाहे संतिया कांड रहा हो या फिर शिक्षक आन्दोलन, कानपुर के रणबांकुरों ने केंद्र और प्रदेश की सरकारं को सदैव नाकों चने चबाने के लिए मजबूर किया है.







भाइयों और बहनों, अब समय बदल रहा है. अब हमारा शत्रु भी बदल रहा है. अब हमें जान लेना चाहिए की आज हम चाहे क्यों न आजाद हो गए हों पर अभी शासन का तरीका नहीं बदला है. अभी भी आम भारतीय शासित हैं हमारे बीच के ही उन लोगों के द्वारा जो हमें अपना नहीं समझते हैं. हमारे देश के एक बहुत बड़े भाग की जनता आज भी इस आजादी का मतलब सरकारी योजनाओं के बंदरबांट से अनजान है.







नयी दिल्ली और लखनऊ से चलने और चलाई जाने वाली कितनी ही योजनाओं का आज भी बहुत बुरा हश्र है. आखिर इसका कारण क्या है - कभी सोचने का प्रयास कीजिये.ये मत सोचिये की ये समस्या केवल हमारी है. इसलिए हमें केवल इससे निपट लेना चाहिए.भाई देखो , ये सब भी तो अपने ही नहीं जो नहीं कह पा रहे हैं . उनकी समस्या को भी अपनी समस्या समझते हुए कुछ ऐसा करो जिससे वास्तविक आजादी लायी जा सके. कैसे होगा वो सब, जिसके लिए आमार पूर्वजों ने अपनी जान दे दी थी. जो आजादी हमें मिली है वो बहुत सस्ते में मिली है. दुनिया के किसी भी गुलाम देश में आजादी के चली लड़ाई में जाने वाली जानों की संख्या पर कभी गौर करो तो पता चल जायेगा की हमारी कुर्बानी संख्यात्मक कम मात्रा के आधार पर गुणात्मक ज्यादा थी. अब ऐसा क्या हो गया की हम उसकी कीमत नहीं समझ पा रहे है ?







आजादी मिली है नकि, स्वछंदता . ये तो सही शाब्दिक अर्थ नहीं था. पर हम तो ऐसे से वैसे हो गए. यानि भ्रस्टाचारी हो गए. किसे और किसने बनाया हमें ऐसा? अब ये सोचने का सही समय आ गया है. कारण ये है कि आजादी के समय कि पीढ़ी के साथ ही वो पीढ़ी भी हमसे दूर जा रही है जिसने 1977 कि क्रांति में सहभागिता अदा कि थी. उनमें से ज्यादातर अब पूरी तरह से जनता के सामने उजागर हो चुके हैं.अब हमें अपना पथ खुद ही बनाते हुए चलना है. और अपने वरद विरोधी यानि भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़नी है.







कानपुर में आये एक धार्मिक बाबा के तरीके से अलग एक नया रास्ता तलाशते हुए कानपुर कि नयी युवा पीढ़ी ने अपने तरीके से इस विरोधी को परास्त करने के लिए हुंकार भरी है. आइये आप सभी अधिक से अधिक संख्या में इस में भाग लें. 26 जनवरी को कानपुर में एक 'मार्च भ्रष्टाचार के विरुद्ध 'में दो कदम हमारे साथ चल सकने का साहस जुटाएं................

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