Tuesday, March 13, 2012

अविरल-निर्मल गंगा के लिए एक और निगमानंद




     गंगा को प्रदूषण मुक्त करने और कुंभ क्षेत्र को प्रदूषण से मुक्त करने की मांग को लेकर अनशन कर रहे मातृसदन के स्वामी निगमानंद की 2011 में मौत तक हो चुकी है। इतना ही नहीं, मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद भी नवंबर 2011 में गंगा को खनन मुक्त करने की मांग को लेकर लंबा अनशन कर चुके हैं। अवैध खनन रोकने की मांग को लेकर निगमानंद पूरे 114 दिनों तक मृत्युपर्यंत अनशन पर रहे, फिर भी उनकी मांग सुनी नहीं गई। अब बारी देश के महान तकनीकी विशेषज्ञ आई.आई.टी. कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संस्थापक संत ज्ञानस्वरूप सानन्द कहलाने वाले पर्यावरणविद प्रो. जी. डी. अग्रवाल के आमरण अनशन की है. जिसकी अनदेखी केंद्र की सरकार कर रही है. सात मार्च से उन्होंने जल भी त्याग दिया है. अस्सी से अधिक की आयु में बिना जल के जीवन की आशा नहीं रह जाती है. उनके साथी राजेन्द्र सिंह, रवि बोपारा और प्रो. राशिद हयात सिद्दीकी ने राष्ट्रीय गंगा बेसिन ऑथोरिटी की अनुपयोगिता और गंगा की दशा में सुधार के लिए जारी श्री अग्रवाल के “गंगा तपस्या” की निरंतर  उपेक्षा का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस्तीफा भेज दिया है.
      गंगा को देश में अनेक धार्मिक - सांस्कृतिक कारणों से मोक्ष और जीवन देने वाली नदी कहा गया है। पर पिछले कुछ दशकों से इसमें जो प्रदूषण फैल रहा है, उससे गंगा के ही खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। स्थिति ऐसी ही रही तो अगले कुछ वर्षों में न तो इसका जल पीने लायक बचेगा, न ही नदी अपने मौलिक स्वरूप में रह पाएगी। “रिवर और सीवर सेपरेशन सिद्धांत” की पैरवी करने वाले डा. अग्रवाल से इस मुद्दे सरकार और हिन्दू समाज के संरक्षक संस्थायें एंव साधु, सन्त की नीति के बारे में पूछने पर डा अग्रवाल बड़े ही सहज रूप से कहतें है कि मुझसे जो बन सकता है में वह कर रहा हूं। शेष आप उन्हीं से जानिए कि आपकी सरकारें और संस्थायें एवं साधु सन्त क्या कर रहे है। मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि गंगा माँ के प्रति बर्ताव में उसे राष्ट्रीय नदी घोषित होने के बाद भी कोई अंतर नहीं आया है और इसे शहरी और औद्योगिक कचरे की मालगाडी मान लिया गया है. श्री अग्रवाल बताते हैं विगत वर्ष दिसंबर माह में गंगा सागर में मैंने स्वामीश्री अविमुकेश्वरानंद, ब्रह्मचारी कृष्णप्रिया, गंगा प्रेमी भिक्षु और राजेंद्र सिंह ’जल-पुरुष’ ने इस गंगा-तपस्या को इसे इसी क्रम में जारी रखने प्रण लिया था. गंगा माँ के लिए बलिदान हो जाने वाले निगमानंद के प्रति उनका अगाध सम्मान है और वो कहते हैं कि अभी गंगा माँ के लिए और बलिदान की आवश्यकता होगी. गंगा की तलहटी पर माइनिंग, शहरी सीवर और औद्योगिक कचरे को गंगा में मिलाने के विरोध की अनदेखी करने वाली सरकारें इसका खामियाजा भोगेंगी. इस तपस्या के मध्य माघ मेला क्षेत्र, इलाहाबाद में आये दिग्विजय सिंह ने तीन माह का समय मांगा था जिसे श्री अग्रवाल ने नकारते हुए और समय नहीं देने का निर्णय लिया था.

इससे पहले भी स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद गंगा पर बन रही परियोजनाओं के खिलाफ हरिद्वार के मातृसदन और उत्तरकाशी में गंगा तट पर अनशन कर चुके हैं। जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ग्रहण करने के बाद प्रोफेसर से स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बने जी.डी. अग्रवाल संन्यास ग्रहण कर खुद को गंगा को समर्पित कर चुके हैं । स्वामी सानंद के अनशन के बाद ही केंद्र सरकार ने लोहारीनागपाला परियोजना बंद कर दी थी। लोहारीनागपाला परियोजना बंद करने और गंगोत्री से उत्तरकाशी तक 125 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र को अविरल बनाने की मांग को लेकर स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने उत्तरकाशी में 13 जून, 2008 से 30 जून तक आमरण अनशन किया था। इसी अनशन के दबाव में सरकार ने लोहारीनागपाला परियोजना बंद कर दी थी. साथ ही गंगा के उद्गम से एक सौ पैंतालीस किलोमीटर तक की नदी कि अविरलता को मान्यता दी थी. श्री अग्रवाल राष्ट्रीय नदी की मान्यता दिए जाने के बावजूद इस नियम को पूरे देश में मान्यता ना दिया जाना और गंगा की जमीन पर निरंतर सिविल योजनाओं का जारी रहना गंगा के स्वास्थय के लिए घातक मानते हैं.
       पूर्व में केंद्र सरकार द्वारा लोहारीनागपाला परियोजना बंद करने का भाजपा और उत्तराखंड क्रांति दल ने भी विरोध किया था। यहां तक कि भाजपा सरकार में मंत्री रहे यूकेडी नेता दिवाकर भट्ट ने तो ज्ञान स्वरूप सानंद के खिलाफ पत्रकार वार्ता बुलाकर उन्हें आईएसआई का एजेंट और उत्तराखंड के विकास का विरोधी करार दिया था। 2009-10 और 2011 के दौरान भी स्वामी सानंद दिल्ली और हरिद्वार में गंगा की अविरलता के लिए आंदोलन करते रहे हैं। हालांकि इस दौरान बांधों का विरोध करने के चलते उन्हें खुद भी विरोध का सामना करना पड़ा है। यहां तक कि हमले की आशंका के चलते उन्हें उत्तरकाशी से अपना आंदोलन दिल्ली शिफ्ट करना पड़ा था।
       2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने से पूर्व गंगा की अविरलता को लेकर अनेक आंदोलन हुए। गंगा सेवा अभियान, गंगा रक्षा मंच, गंगा बचाओ अभियान के नाम पर इस दौरान खूब सियासत हुई। यहां तक कि गंगा रक्षा मंच के बैनर पर स्वामी स्वरूपानंद के दो चेलों ने 2008 में ही हरकी पौड़ी के निकट सुभाषघाट पर 38 दिनों का आमरण अनशन किया था। इतना ही नहीं, बाबा रामदेव भी तब इस आंदोलन में कूद पड़े थे। विश्व हिंदू परिषद से लेकर बजरंग दल तक ने गंगा से जुड़े आंदोलन में खूब सियासत की। हालांकि इन्हीं आंदोलनों का नतीजा था कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के साथ ही राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन भी किया गया। बावजूद इसके यह सवाल आज भी उतना ही बड़ा है कि गंगा बेसिन प्राधिकरण और गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के बावजूद क्या गंगा का कोई भला हो पाया। 



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