Friday, March 2, 2012

एक अदद क्रान्ति को तरसता देश



दिलीप कुमार खून को आसमान पर उछाल कर जोर से चिल्ला रहे थे, "हम इस खून से आसमान पे इन्कलाब लिख देंगे..... क्रान्ति लिख देंगे......"...
तालियों की गडगडाहट के साथ "हीर पैलेस" के परदे पर सिक्कों की बौछार......
याद आ गयी ये फ़िल्मी क्रान्ति.
.....
.......
मैं नहीं एक "लाल क्रान्ति" के समर्थक आज बोले इस देश में कोई क्रान्ति अब नहीं हो सकती.
वो बेलौस बोले जा रहे थे,......अब क्या कभी नहीं हुयी है....
मैंने कहा क्या बात करते हो दादा ????
अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रान्ति याद करो !!!
लगता है, सब भूल गए हो .......उसके बाद गांधी की क्रान्ति के बदौलत आज तुम्हारी राजनीतिक और आर्थिक आधार बराबर करने वाली वाली साम्यवादी क्रान्ति हुयी है....
इनके बाद जे. पी. का आन्दोलन और सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान क्या कम क्रान्ति थी ????
.....बस फिर क्या था???
दादा हत्थे से उखाड़ते हुए बोले - माना की बंगाल सहित तमाम देश में हमारा लाल रंग कमजोर और फीका पड़ा है पर इसका ये मतलब नहीं की अब तुम जो कहेगा हम उसको मान ही लेगा....
तुम क्या जानो क्रान्ति???
फ्रांस में हुयी थी क्रान्ति....
अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रान्ति केवल राज खोये राजाओं का विरोध थी..
गांधी ने क्या ख़ाक क्रान्ति की..अंग्रेजों के हटाने के अलावा उसी राज-व्यवस्था को जारी रखा...और तुम्हारे जे.पी. तो कुछ भी नया स्थापित नहीं कर पाए..
दे गए इस देश को एक अदद लालू, जो खुद सारा चारा खा गया और अब गोबर नहीं दे रहा है...
अब तुम कहेगा कि अभी हाल में हुआ वो मोमबत्ती क्रान्ति. अरे पगले, वो तो अन्ना की अगुआई वाली टेलीविजन चैनलों की इवेंट्स कि 'क्रान्ति' थी......
मैंने कहा – क्या दादा ! तुम भी अब अरविन्द त्रिपाठी बन गए ??? अन्ना आंदोलन के विरोध में उसकी तरह इस हद तक चले गए कि खुद जिस आंदोलन का हिस्सा थे उसी के खिलाफ ख़बरें लिखने लगे.... मैंने अभी अपनी बात पूरी तरह कहा भी नहीं था कि....
दादा बोले , तुम किन लोगों के दम पर क्रान्ति की बात करते हो???
गंदे बदबूदार पायरिया की मार खाए दांतों वाले व्यक्ति और कुछ फ्यूज्ड लोगों के साथ घूमने वाले के भरोसे "गंगा क्रान्ति" की ?
या फिर छके पेट वाले लोगों के दम पर गरीबी और जन-समस्याओं को हटाने का आडम्बर करने वालों की ??????
और रही बात जिस अन्ना की जिस "मोमबत्ती क्रान्ति" की बात तुम बहुत बढ़-चढ़कर कर रहे हो, वो असल में बहुत गरीब उन लोगों का जमघट होता था जो केवल आते ही इसलिए थे कि शाम की व्यवस्था हो जायेगी....
मैं चौंका कि दादा ये क्या और क्यों कहा ???
वो बोले अरे पगले.... मैं कह रहा हूँ की बिजली जाने के बाद खाना खाने पकाने के लिए मोमबत्ती कि व्यवस्था के लिए आते थे....
अभी कम अनुभव है तुम्हें..... इस देश में पेट भर लेना ही क्या किसी क्रान्ति से कम है ?????
फिर कुछ सोंचते हुए दादा बोले....... हाँ इस देश में जूता और चप्पल-क्रान्ति जरूर जल्दी-जल्दी होती है.... ना मानो तो किसी मंदिर में जाकर देखो... तमाम लोग नंगे पैर जाते हैं और नए और ताज़ा फैशन के जूते या चप्पल में घर जाते हैं...
और सबसे बड़ी बात ये कि जनता में से किसी को भी जूता या चप्पल फेंककर मारा जाना भी तो क्रान्ति ही है????
मैं अब लाजवाब हो गया था......

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