Thursday, February 3, 2011

एक सत्य......

मित्रों,
अंतिम समय,
जब छोड़ देते हैं सब साथ,
तब भी एक वृक्ष ही,भले ही हो वो मृत, देता है साथ,
अपनी चिडिओं,गिलहरिओं,घोसलों और मौसमों को छोड़कर,
हमें बचाने का अंतिम प्रयास करता सा,वही करता है हमारे पहले अग्नि में प्रवेश,
जलते तो हम रहेते ही हैं पूरे जीवन भर,पर अंतिम चिता में जलने में भी जरूरी होता,
वह अकेला,हाँ , एक अकेला,
जीवित नहीं मृत,
एक वृक्ष .
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और हम हैं कि लक्ष-चंडी यज्ञ जैसे आयोजनों के माध्यम से हजारों-हज़ार आम के वृक्षों कि लकड़ी कि आहुति दे चुके हैं. प्रखर बाबा और हम जैसे अन्य पापात्माओं ने आम के क्या एक बबूल भी नहीं रोपा है. हमें अपने अंतिम संस्कार के बारे में सोच लेना चाहिए. मुझे तो लगता है कि हम सभी 'बेशर्म की लकडीओं' के ढेर में जलाए जायेंगे. क्योंकि जैसा चरित्र हो गया है अब हमारा उस स्थिति में आम से जलाए जाने लायक तो रहे नहीं. रही बात घी कि तो उसे छोडिये हम सभी नरसिम्हाराव से भी गए गुजरे साबित होंगे और उन्हें तो मिट्टी का तेल नसीब हो गया था हमारे जैसों को मिटटी का तेल भी नहीं नसीब होगा.उसको गरीबी के रेखा से नीचे के लोगों के लिए सुरक्षित कर दिया जाएगा. हे ईश्वर , अत्यंत तपस्वी प्रखर बाबा जैसे लोग तो सशरीर स्वर्ग चले जायेंगे, हम-सब बीच के लोगों का क्या होगा ? वास्तव में कष्ट भी सदा से बीच वालों को ही रहा है.
.....................आमीन.

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