Wednesday, November 16, 2011

टोपी और बन्दर

           एक पुरानी दंतकथा है. बचपन में शायद पंचतंत्र में पढ़ी थी. अब तो बचपन में ये सब पढ़ा नहीं जाता. शायद अब तो वैसा बचपन भी नहीं आता. उसमें भी मशीन आ घुसी है. मशीनी और वर्चुअल स्पीडी खेलों वाले खिलौने तथा कार्टून फ़िल्में  आ चुके हैं जो कामिक्स बुक्स को भी खा चुकी हैं, इन्होंने देशी खिलौनों और  देशी नैतिक कथाओं वाले साहित्य को चलन से हटा दिया है.
             मैं  भी, क्या ले बैठा ?? चलिए कोई बात नहीं, आपको सीधे कथा  सुनाता हूँ. एक व्यापारी था. व्यापारी था तो कुछ बेचता भी होगा न. हाँ, वो टोपियाँ बेचता था. एक बार वो कई डिजाइन की टोपियाँ सैम्पल में लेकर जंगल के रास्ते किसी दूर के बाज़ार में जा रहा था.पैदल चलने के कारण हुयी  थकान से उसने एक घने पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम करने की सोंची. जल्दी ही उसे झपकी लग गयी. जब उठा तो उसने देखा की उसके झोले में रखी सभी टोपियाँ गायब थीं. इधर-उधर देखने पर उसे पता चला की बंदरों ने उसकी टोपियाँ पहन ली है.उसने उनसे विनती की, रोया, गिडगिडाया, चीखा-चिल्लाया. बंदरों ने भी उसकी हर नक़ल की , पर टोपियाँ नहीं लौटाईं. थक-हार कर उसने अपनी टोपी उतार कर जमीन में फेंक दी और हताश-परेशान वो सोंचने लगा की कैसे इन बंदरों से पार पाया जाए. तभी आश्चर्यजनक घटना घटी की सभी बंदरों ने भी अपनी टोपियाँ उतार कर जमीन में फेंक दीं. व्यापारी ने उठाईं और अपने रास्ते निकल लिया.
          आजादी के बाद से अब तक समय-समय पर  (महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे) नामक तीन व्यापारी टोपियां लेकर ऐसे ही इस देश में निकले.काम करते-करते  जंगल में सभी बारी-बारी से सो गए. सभी के साथ एक जैसा ही हुआ. बन्दरों ने उस पुरानी कथा को पढ़ रखा है, जिसमें व्यापारी ने अपनी टोपी फेंककर  उन्हें बन्दर से उल्लू बनाया था. वो चालाक हो चुके हैं. उनके साथ दूसरे जंगलों के माफिया और अपराधी बन्दर भी थे. उन्होंने इस जंगल के बंदरों को ज्ञान दिया . उनके बंदरत्व को ललकारा.उन्हें कहा की उनके पूर्वजों की मूर्खता का ये मनुष्य हर बार फायदा उठाते हैं.इस बार उन्होंने इन सीधे बंदरों को सिखाया की कैसे इस व्यापारी बने मनुष्य को सबक सिखाया जाए और इसके नाम और काम की पूँजी को टोपी के साथ लूट लिया जाए.
            परिणामस्वरूप बंदरों ने तीनों बार एक जैसा ही किया. उन्होंने अब ये दिखाया की कैरेक्टर में गिरावट अकेले मनुष्य में ही नहीं उनमें भी आई है. हर बार उन्होंने व्यापारी के जागने और उसके टोपी फेंकने का इंतज़ार किया. कारण साफ़ है, जब वो अपनी टोपी भी फेंक दे तो उसे भी उठा ले चलो. और अपनी "बंदर संसद" में बताओ की ये व्यापारीनुमा महामानव समय के साथ कितना मूर्ख बन चुका और वो कितने बुद्धिमान......समय वास्तव में कितना बदल चुका है. अब जंगल में रह रहे बंदरों ने झांसे में आना छोड़ दिया है.और इसी तरह अब बच्चों ने भी पंचतंत्र पढ़ना छोड़ दिया है. वो आजके युग के बंदरों के हिसाब से नई साहित्यिक रचनाओं की खोज में हैं. जिसमें लम्पटई के नए अध्याय हों. नए अधुनातन चरित्र हों......अब लगता है नए प्रपंचतन्त्र की रचना का समय आ गया है.



3 comments:

  1. बहुत सही कहा।

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  2. bahut achchha hai sir

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  3. bahut khoob... sab topi ka khel hai... kuch pahnne walon ka to kuch pahnane walon ka. rang koi bhi ho.. topi to topi hi hai.... bahut shandar lekh. adarniya agraj ko bahut-bahut badhai.

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