Sunday, November 20, 2011

दिल्ली, बाई-ट्रेन

दो-दिवसीय दिल्ली  की यात्रा से वापसी के समय पांच  घंटे की यात्रा के पन्द्रह घंटे में पूरी होने पर प्रमोद तिवारी जी द्वारा लिखा गया ये लेख याद आया. इसे मैं साभार उनके ब्लॉग से लिया है.

शीघ्र ही मैं भी अपनी यात्रा का अनुभव आप सब से साझा करूँगा, तब तक इसका रसास्वादन करें.

धन्यवाद .

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मेरी दिल्ली जाने की तैयारी थी। न जाने कहाँ से मैने यह बात दुनिया लाल को बता दी। दुनिया लाल मेरे मित्र हैं। उन्होंने पूछा, 'काहे से जा रहे हो...?' मैंने बता दिया, बाई-ट्रेन। बस, फिर क्या था... पूरा इलाका जान गया कि मैं बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहा हूँ।
मैं दूध लेने निकला था। चौराहे पर पन्ना लाल पनवाड़ी के पास रुक गया। उन्होंने एक जोड़ा पान मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं पान दबाकर आगे बढऩे ही वाला था कि वह बोले, 'भैया! सुना है, आप बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो।' मैने कहा, 'हाँ ! लेकिन तुम्हें कैसे पता ...?'  वह बोले 'दुनिया लाल आये थे। कह रहे थे उन्होंने आपको बहुत समझाया... लेकिन आप माने ही नहीं।... क्या बात हो गई? जो आप बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो...?'  मैं इसके पहले भी दुनिया लाल की दोस्ती से कई बार मुसीबत में पड़ चुका था। इसलिए कुछ कहे बगैर मक्खन सिंह की दुकान की ओर बढ़ गया।
मक्खन सिंह मानो मेरा ही इंतजार कर रहे थे। देखते ही चहक उठे, 'सुना है आप कौनो मंजन वाली अंताक्षरी में भाग लेने दिल्ली जा रहे हो बाई-ट्रेन?'  मैने कहा 'ये सब तो ठीक है लेकिन तुम्हें कैसे पता...?'  मक्खन ने बताया 'दुनिया लाल आये थे कह रहे थे। जिन्दगी में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि आदमी जरा-जरा सी बात में बाई-ट्रेन दिल्ली जाने लगे।' मैं झुल्ला गया... अमां दिल्ली जाना है। बाई-ट्रेन न जाऊँ  तो क्या स्कूटर स्टार्ट कर दूं...? फिर लगा मक्खन से उलझना बेकार है। जो कहना है दुनिया लाल से कहूंगा। मैं दुनिया लाल के घर की ओर लपक लिया। रास्ते में चचा राम केवल अपना सेलून खोल चुके थे। मैने सोंचा कटिंग करा लूं। सो, कुर्सी पर बैठ गया। चचा ने खटखटाई और शुरू हो गए।...'अखबार की खबर थी कि अटल जी दिल्ली-लाहौर बस चलवा रहे हैं।...' हाँ, मैने सहमति में अपना सिर हिला दिया। चचा का हौसला बढ़ा। वह बोले, 'फिर आप क्यों बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो...? दुनिया लाल की आप न माने लेकिन अटल जी का इशारा तो समझें...।'  मैं समझ गया दुनिया लाल आज कल में ही चचा से सिर घुटवा कर गए हैं। ...गंजा कहीं का।
अब मेरा बर्दाश्त जवाब देने लगी थी। मैं सीधे दुनिया लाल के घर की ओर लपका।...अबे! तूने पूरे मोहल्ले में यह क्या रब-रब फैला रक्खी है। दुनिया लाल बोले, यार मैं तेरा दोस्त हूँ, कोई दुश्मन नहीं। तू देख, पिछले एक हफ्ते में कानपुर-दिल्ली लाइन में क्या कुछ नहीं हुआ। लूट हुई, जहर खुरानी हुई ,  पटरी टूटी, डिब्बे उतरे, लोग जख्मी हुए, जान पर बन आई, ऐसे में मेरा क्या फर्ज है। आज तुझे मेरी बात समझ में नहीं आ रही। कल जब तेरी औलादें बाई-ट्रेन दिल्ली जाएंगी तब समझ में आयेगी। मैं दुनिया लाल की बातों से 'कनफ्यूज' हो गया। अब सोंचता हूँ, बाई-बस ही निकल जाऊँ।
प्रमोद तिवारी

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"सहारा समय" साप्ताहिक में यह लेख पूर्व में प्रकाशित हो चुका है.

1 comment:

  1. वाह रे...... दुनियालाल ,, कह ही दिया आखिर में .

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