Friday, March 18, 2011

होली की रंगीनियाँ और मैं

तुम नहीं, गम नहीं, शराब नहीं,

ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं।

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजै,

दिल से बेहतर कोई किताब नहीं।

जाने किस किस की मौत आई है,

...आज रुख पे कोई नकाब नहीं।

वो करम उंगलियों पे गिनते हैं,

जुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं।

साभार - विष्णु त्रिपाठी

मित्रों, इसे पढ़ा,तो लगा की ये लाइनें मेरे लिए ही लिखीं गयी हैं. आज होली है , और जीवन बेरंग सा है. ऐसा नहीं की मेरे जीवन में कभी रंग नहीं आये थे.पर अब वो किसी और के आँगन में अपना असर छोड़ रहे हैं. और अपने वजूद से मेरी पहचान को मिटाने में लगे हैं. प्रेम का ये गाढा रंग मिलन और विछोह के बहानों से मिलाकर बनाया गया होता है.अब वो नहीं हैं, पर होली आई है. रंगीन भी है. पर आज बिना उल्लास का मैं बहुत अकेला हूँ, सारा ज़माना है पर आज मन स्तब्ध सा है.

उनके बिना बचे जीवन में कुछ शेष रंगों को समेटता हुआ मैं विवाह के लगभग बारह वर्षों के बाद फिर अकेला हूँ. पत्नी बीमार है. और साथ नहीं है.शायद, मैं उसके विशवास को जीत पाने में कहीं कहीं सफल नहीं हो सका. आज पुत्र के साथ वो अपने अपनों के साथ है. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता 'मैं अकेला .......' की पंक्तिओं को याद करता हुआ मैं अपने जीवट और जिद्दी स्वभाव के साथ प्रस्तुत हूँ.पर जीवन में अब रंग नहीं दिख रहे .बेरंग हूँ पर निराश नहीं. हताश नहीं, पर थकान सी है. देखता हूँ की नया क्या किया जाए जिससे दुनिया को रंगीन किया जा सके. लगता है की अब अपने वजूद को भूलने और भुलाने का सही वक्त आ गया है. अब दीवानों की तरह से काम करने की जरूरत है और यही तो सही समर्पण और सच्चा प्रतिशोध होगा इन खोये हुए रंगों के लिए.

कल मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने कहा की हँसना भी एक कला है.हँसने में तनावों को खोजो. तनावों में हँसने की बात तो सभी कहते और करते हैं.सोचा तो लगा की ये सही हैं क्योंकि यथा नाम तथा गुण 'अरविन्द' मतलब कीचड में कमल. तो मित्रों कीचड भी है जिसे साफ़ करना है. यहाँ तो लोग काजल की कालिमा से ही घबराए होते हैं. अब देखिये तनावों और समस्याओं के कीचड से मुक्ति दिलाने कौन आता है ? न भी आये तो भी हम तो कमाल हैं ही.

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