Sunday, June 19, 2011

आई जलेबी बाई

लो कल्लो बात. फिर से बीच मैदान आखिर वो आ ही गयीं. जब वो नहीं थीं तो शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी से देश काम चला रहा था. चुलबुल पांडे भी कैरेक्टर ढीला किये हुए थे. देश अन्ना और रामदेव में व्यस्त था. की तभी उन्होंने बड़ी झन्नाटेदार एंट्री मारी है.

ज्यादा मत सोचिये ? और कौन होंगी ? अपनी पांच साल पुरानी 'मर्डर' फिल्म ...से हिट हुयी, वही देश की प्यारी-दुलारी ,नंगी-पुंगी-मल्लिका शेरावत हैं . अपने देश के सारे पुरुष अपनी पत्निओं से छुपाकर उनकी कामना करते हैं. चुपके-चुपके उसके फोटो देख ही लेते हैं जैसे बैन होने के बाद भी देश के सारे पत्रकार "भड़ास" देख लेते हैं.

वैसे अगर मैं स्त्री सौदर्य की व्याख्या में तल्लीन हो जाऊं तो बुरा मत मानियेगा . ये सुंदरता होती ही ऎसी चीज है , बस किसी में भी लगने लगती है. फिर वो तो हैं ही ऎसी की मन उनका नाम आते ही 'गिली-गिली-कम्पट' हो जाता है. दोस्तों, अभी एक फिल्म में वो जलेबी बाई बनी हैं और एक गाने में थिरकी हैं . अजी , क्या कमाल का थिरकी हैं ! काश आज 'एम्. एफ.' होते ! खैर, कोई बात नहीं,हम भी एक हाथ में कूंचा-कूंची लिए एम्. एफ. बन जाना चाहते है. चचा तो चले गए पर हमारे जैसे भतीजे छोड़ गए हैं. ज्यादा नहीं तो दीवाने कैसे होते और बनते हैं ये तो उनसे सीखा ही जा सकता है. 'हम आपके हैं कौन' उन्होंने पचासी दफा देखी थी. वो भी एक खास गाने में माधुरी के नितंबों पर गुलेल के पत्थर के लगने के बाद का 'खास इफेक्ट' यानी थरथराहट देखने जाते थे.

देखो , हम इतिहास के विद्यार्थी ठहरे. दोहराने का मन हो आया है. मर्डर में उनके लबों की थरथराहट कम गजब नहीं थी. रही-सही कसर उन्होंने अब पूरी कर दी है.जलेबीबाई का बेली डांस देख के मन काबू में नहीं है. अब हमने तो अपने मन की गाँठ खोल दी है. ज्यादा सिद्धांतवादी बने बिना सीधे गाना देखो, और तब अपने जज्बातों की बौछार हम पर करना.

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