Monday, October 17, 2011

छोड़ आये हम "अन्ना"

आज कानपुर में अन्ना को छोड़ कर सभी थे.....
वास्तव में इनमें अन्ना नहीं थे...
अन्ना जैसा भी कोई नहीं था..
ये सभी अन्ना को छोड़कर ही तो आये थे..
.....
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आज अरविन्द केजरीवाल ने कानपुर में कहा की यदि कांग्रेस संसद के शीतकालीन सत्र में लोकपाल बिल लाती है तो उसका विरोध नहीं किया जाएगा.
अब मामला जन-लोकपाल बिल की मांग का भी नहीं रहा.
कैसा भी ..... कहीं से भी..... बस "चंद्र खिलौना लाओ" नहीं तो हम ऐसे ही सडकों पर फ़ैल जायेंगे.
सोचो, देश सोचो,
इनका मंतव्य जानो और सोचो........
इनका वास्तव में देश सुधारने का कोई इरादा नहीं है.
आप सब भी तो कुछ सोंचो.......
मेरा दिमाग तो आज जड़ हो गया है...
देश को अपने इशारों पर नचाने वाले शूरमाओं बस अब बहुत हो गया..
जब सब हमें ही करना है तो हमारे हाल पर छोड़ दो..
तुम सब तो राजनारायण से भी बड़े विदूषक साबित हो रहे हो.
खालिस जुमलेबाजी और शेरोशायरी से देश का निर्माण कैसे करोगे????
अब इस जागी जनता को और लूटने का ढूंग सही नहीं .
जब राजनीति करनी नहीं तो उसकी बात भी ठीक नहीं...
जो काम आता है वही करो तो ज्यादा ठीक होगा....
आगे तुम्हारी और ऊपर वाले की मर्जी...
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भ्रष्ट कुलदीप को जीता कर जश्न मना रहे इन कथित युव-नायकों से भले तो अन्ना हैं जो मौन हैं..
पर ज़रा गौर करिये क्या सच में वो अच्छे है ????
आज जब देश उनको सुनना चाह रहा था वो मौन हो गए .
आंदोलन ऐसे दोराहे पर है , और वो मौन हैं...
उनका अब अपना कुछ नहीं है. 
वो देश के हैं और देश उनका है....
उनका  एक साथी कश्मीर सहित देश के कई टुकड़े करने का तर्क दे रहा है और वो मौन हैं....
सर्वोच्च न्यायालय वित्तीय अनियमितताओं की नोटिस दे रहा है और वो मौन हैं...
तेरह दिन के आमरण अनशन में जब उन्हें अपनी ऊर्जा बचानी थी तब वो जनता और देश के सामने थे और बोल रहे थे ... और आज इन सब सवालों के जवाब दिए वो मौन हैं.....
ऐसे में वो मौन हैं....
आपातकाल के समय विनोबा भावे के मौन की ही तरह.....
क्या देश इस मौन की भी कीमत चुकायेगा ???????

5 comments:

  1. अब तक के आपके लेखन कार्य की सर्वोच्च प्रस्तुति ... कलमकार का आक्रोश् इससे बेहतर तरीके से नहीं प्रदर्शित किया जा सकता था .. बधाई

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  2. नमस्कार अरविन्द जी ,
    आपकी बात मुझे पूरी तरह जची नहीं अन्ना मौन व्रत तो है लकिन एक हफ्ते के लिए और उसके बाद तो वो बोलेंगे बाकी प्रयास अन्ना टीम कर रही है जो वो सब प्रयास सही गलत हो सकते हैं लकिन ये क्य्नो नहीं समझते की लड़ाई भी तो महा घाघ लोगो से है

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  3. अरविन्द जी, आप इतना अच्छा लिखते हो, हमें नाज़ है.
    किन्तु इस संशय की स्थिति से बाहर निकालिए, मित्र.
    अन्ना ने मौन व्रत लिया है पर अपने विचारों से अभी भी अवगत करा रहे हैं:

    https://annahazaresays.wordpress.com/category/post-in-English/

    ये अन्ना के युवा सिपाही अति उत्साह में कुछ गल्तियाँ कर सकते हैं. उस के लिए हम सबको जागरूक रहना चाहिए.
    पर, सियासत के दलदल में फंसे पुराने खिलाड़ियों की जगह, इन नौजवानों पर विश्वास करना कहीं बेहतर होगा.

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  4. महान दार्शनिक सिसरो ने आज से २००० वर्ष पूर्व कहा था
    चुप रहना एक कला हे और मौन भी बहुत कुछ बोल सकता हे, लेकिन सुनना एक ऐसी कला हे जिसे मानवता ने भुला दिया हे आज अच्छे श्रोता दुर्लभ हो गए हे
    अन्ना तो अपने आंदोलन की दुर्गति से सन्निपात की स्थिति में जाकर मौन हो गए हे , परन्तु अन्ना टीम का बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा हे / हिन्दुस्तान में भीड़ की कमी नहीं हे जब तक भीड़ हे अन्ना टीम की दुकानदारी चलती रहेगी / क्या फर्क पड़ता हे /बाबा की तरह इनके पास बेचने को कोई दवाई न सही / लेकिन सपने और iac की ५० रूपए की टी शर्ट २०० रूपए में बेचने का धंधा अच्छा चल पड़ा हे /इस देश में हर आदमी कुछ न कुछ बेच कर अपनी गाडी चला रहा हे शायद ऐसी का नाम चलती गाडी हे ईश्वर भीड़ को सदबुद्धि दे ताकि वह भी भ्रम की स्थिति से बाहर आकर कुछ सही गलत का अंदाजा लगा पाए ..... आमीन

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  5. एक बहुत ही सुन्दर लेख निस्संदेह सर्वोत्तम .
    हिंदुस्तान पहले राम भरोसे कहा जा रहा था. राम भरोसे तो खर्च हो गया. अब रह गया अन्ना भरोसे. अन्ना तक भी ठीक कहा जा सकता था. लेकिन अब तो अन्ना ने मौन धारण करके सिपाही लाल भरोसे छोड़ दिया है. अन्ना के सिपाही लाल नंबर एक, नंबर दो और नंबर तीन तो जनता ने समझ लिए और जो समझदार थे वो छोड़ के चले गए. अब देखना है कि और किस-किस के भरोसे भारत का भाग्य लिखवाया जायेगा....

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