Friday, May 6, 2011

भ्रष्टाचार हिंसा, सदाचार अहिंसा है. राजेन्द्र सिंह अध्यक्ष,तरुण भारत संघ. एवं जल-बिरादरी

लूट से बचने या मानवीय और प्राकृतिक हालात को बेहतर बनाने का विचार ही क्रान्ति है. बदलाव लाने का विश्वास और एहसास लोक मानस में क्रान्ति शुरुआत है. यह क्रान्ति शांतिमय और रचनात्मक होती है.तो प्रकृतिमय जीवन की समृद्धि करता और अहिंसा को आगे बढ़ाती है.
हिंसक क्रान्ति होने के बाद विकास का रास्ता पकडती है. विकास की शुरुआत तो विस्थापन से ही होती है. फिर गैरबराबरी आती है. अंत में धरती का बुखार और मौसम का मिजाज़ बिगाड़ने वाला हिंसक विनाश होता है. यही जापान और रूस में हुआ था. अब चीन, अमेरिका और यूरोप में यही हो रहा है.
भारत में शांतिमय संघर्ष से क्रान्ति हुयी है. शान्ति से आजादी मिली थी. इसलिए यहाँ के ज्ञान का विस्थापन ,विकृति और विनाश अपेक्षाकृत कम है. अहिंसक क्रान्ति से आजादी मिलने का परिणाम हमारा लोकतंत्र आज भी सुरक्षित है. नदी कूच, जनसत्याग्रह और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन या सत्याग्रह जहां ग्रूरत है, वहाँ चल पाते हैं. व्यवस्था में बदलाव भी करते हैं.
हमारी संवेदनशील सरकारें भी समय से निर्णय लेती हैं. जहां समय से जनदबाव को सम्मान देकर निर्णय नहीं लिया जाता है; वहीँ भारत में भी हिंसक आंदोलन होते हैं. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से सरकार ने बहुत संवेदनशील होकर जल्दी निर्णय लिया तो हिंसा से हम सब बच गए. भ्रष्टाचार हिंसा ही है. भ्रष्टाचार से मुक्ति 'सदाचार' अहिंसा है. सदाचार केवल क़ानून से नहीं आता है. शिक्षण, रचना, संगठन सत्याग्रह से सदाचार बनता है.
भ्रष्टाचारी व्यवस्था में बदलाव ही अब छोटे समूह का 'साध्य' है. साध्य की सिद्धि हेतु सत्यग्रह और आंदोलन साधन है. जैसे आजकल एक 'नदी कूच' नामक आंदोलन चल रहा है. नदी और नालों को अलग-अलग रखने वाली व्यवस्था बनाने हेतु नदी नीति व नियम बनवाना इसका साध्य है. नदियों का नाला बनना भ्रष्टाचार है. नालों को नदी से अलग रखकर नाले को नदी बनाना सदाचार और अहिंसा है.
राज्य सरकारों पर जन दबाव बनाने हेतु नदी कूच का लोक शिक्षण चल रहा है. इसी शिक्षण प्रक्रिया में प्रत्येक राज्य की लोक नदी नीति तैयार करके मुख्यमंत्रियों को देना है. भारत की नदी नीति का प्रारूप श्री सलमान खुर्शीद, जल संसाधन मंत्री को विश्व जल दिवस २२ मार्च को दिल्ली में तथा श्री जयराम रमेश, पर्यावरण एवं वन मंत्री, भारत सरकार को १४ मार्च. २०११ के दिन इनके कार्यालय में पहुंचकर दे दी है.
यह गरीबों के जीवन और जीविका बचाने हेतु चल रहा नदी कूच अभी तक हिमांचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश के  मुख्यमंत्रियों को नदी नीति प्रारूप प्रस्तुत कर चुका है. अब इनसे इस नदी नीति को राज्य नदी नीति के रूप में घोषित कराना और इसके प्रकाश में क़ानून बनवाना है. यही नदियों के लिए आंदोलन है.
आंदोलन साध्य और साधन शुद्धिका ख्याल अपनी साधना में रखना है.जब भी साधन पाने के तरीकों की शुद्धि को आंदोलन भूल जाता है, तो अमाज साध्य से विचलित होकर जल्दी ही हटने लगता है. महात्मा गांधी ने आजादी आंदोलन में साधन शुद्धि का बहुत ख्याल रखा था. इसीलिए उनके आंदोलन की आत्मा में केवल सत्याग्रह ही दिखाई देता है. अभी साध्य और साधन शुद्धि के प्रति आंदोलन सचेत दिखाई देते हैं. ये ही आंदोलन सफल होंगे, जिनमें सत्य का आग्रह दिखाई देगा.
आजादी के आंदोलन में साधना ही साध्य तक पहुंचाती थी, साधन की शुद्धि थी. इसीलिये साधना को सिद्धी मिली थी.यह प्रक्रिया लोकतंत्र में अब अपमानित हुयी है. इसी कारण अब प्रायोजित आंदोलन बहुत ऊपर दिखाई देते हैं. सहज स्वस्फूर्त सत्याग्रह या आंदोलन नीचे दब जाते हैं.भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल क़ानून बनवाने हेतु आंदोलन चल रहा है. यह भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने वाला है ? इसे भारत के मीडिया ने अपना लिया है. मीडिया ने इसे बड़ा सम्मान दिया है. भ्रष्टाचार मुक्ति की साक्षरता कार्य इस आंदोलन में मीडिया द्वारा किया जाता तो अधिक अच्छा रहता.
समाज स्वयं भी प्राकृतिक संसाधनों का समता-सादगी से उपयोग करे. तभी लूटने वालों से लड़ सकते हैं. ऎसी लड़ाई ही सफलता तक पहुँच सकती है. समता-सादगी से प्राकृतिक संसाधनों का लोक उपयोग करेगा तभी भ्रष्टाचार मिटेगा. सदाचार पनपेगा.
सदाचार नीचे से ऊपर जाता है. भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे आता है. नीति-नियम का बननाऔर पालना कराना ऊपर के चालू भ्रष्टाचार के कारण घातक होता है. यह पूरी प्रक्रिया अतिक्रमण और भ्रष्टाचार की तरफ ही मुद् जाती है. ऊपर से ऊपर ज्यादातर भ्रष्टाचारी शक्तियां अपने हित में बड़े लोक निर्णय को भी बदलवाती है.धन,शक्ति, जनहित को दर-किनार करके कुछ ही लोगों के हित में क़ानून-कायदे बना देती हैं.
महात्मा गांधी यूरोप की सनसन को इसीलिए वैश्या कहते थे. फिर भी वे भारत में संसद बनाने को उचित मानते थे. लोक समझ, लोक शक्ति और लोक व्यवहार, लोक संस्कार को लोक समृद्धि में लगाने का एक मात्र तरीका संसद को ही मानते था. संसदीय व्यवस्था जब भी ठेकेदारी से चलती है, तभी महात्मा गांधी संसद को वैश्या कहते थे. लोक समझदारी से गठित संसद को वे बहुत सम्मान करते थे. इसीलिए भारत की लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था भी उनकी नजरों में सम्मानित थी.
संसद को ठेकेदारी से दूर रखने वाला काम लोकपाल क़ानून बनाना, जनसत्याग्रह, नदी कूच, यमुना सत्याग्रह तथा आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय जगह-जगह शिक्षण, रचना, संगठन व संघर्ष में जुटकर कर रहे हैं. आजकल भारत में नए आंदोलन उभर रहे हैं. महात्मा गांधी के सत्याग्रह की रूपरेखा नहीं बन रही है. भारत की संसदीय व्यवस्था को सुधारने वाला सत्याग्रह अब बहुत जरूरी है. हमारी संसदीय सदाचारी लोक चेतना जरूरी है. ये कार्य अब "नीर-नारी-नदी" को सम्मान देने वाली समता-सादगी पूर्ण व्यवस्था के साध्य वाले सत्याग्रह से ही होगी.
लोकतंत्र समृद्धि हेतु सत्याग्रह जरूरी है. संसद की समृद्धि लोकाधार से बनती है. लोक शिक्षण संसद या लोकतंत्र का जरूरी काम  होता है. एक छोटा समूह राष्ट्र के लोक का शोषण करने लगे. भ्रष्टाचार से लोक पीड़ित हो जाए तब एक समूह भ्रष्टाचार की पीड़ा से मुक्ति हेतु आगे आना और हल खोजना आवश्यक नहीं है. संसदीय व्यवस्था लोक हितकारी और जिम्मेदार बने इस हेतु सभी स्तर पर प्रयास जरूरी है.
जब कोई व्यक्ति या समूह सत्य के लिए आग्रही है, तो ही उसे 'सत्याग्रही' कहते हैं. लोक जब अपना जीवनाधार लूटता देखकर लड़ने लगता है तो उसे 'आंदोलन' कहते हैं. अन्याय का प्रतिकार करने तथा रचना करने वाली प्रक्रिया को परिवर्तन कहते हैं. बदलाव के लक्ष्य को जिस तरीके से हम प्राप्त करते हैं वाही आंदोलन या सत्याग्रह कहलाता है.
आंदोलन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है. भारत के लोकतंत्र को बचाने और मजबूत करने में इनकी खास भूमिका है. आंदोलन भारत में सफलता पाते ही हैं. यही हमारे लोकतंत्र की खासियत है. शुद्ध साध्य को पूर्ण करने वाली साधना से ही सत्याग्रह चले, तभी इनका प्रभाव स्थायी होगा.
बे जमीन और बे घरों को जमीन  मिले इस हेतु 'जन सत्याग्रह २०१२' एकता परिषद द्वारा देश भर में चालू है. ये गरीब-बेसहारो  को संगठित करके जमीनी हकदारी दिलाने का कार्य छ्त्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के साथ  पूरे देश में चला रहे हैं. इसी प्रकार विकास द्वारा विस्थापन, विकृति और विनाश विरोधी आन्दोलनों को राष्ट्रीय समन्वय द्वारा चलाया जा रहा हजी. ये सभी आंदोलन आत्मा से एक हैं. इनके साध्य भी एक ही दिखाई देते हैं.
साधन भिन्न है. सत्याग्रह तो साध्य-साधन और शुद्धि का ख्याल रखने वाला होता है . आंदोलन कभी-कभी लालच को पूरा करने और लाभ कमाने हेतु भी होता है. अहिंसक आंदोलन सदाचारी तथा हिंसक आंदोलन साध्यकारी होता है.

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