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साहब का "तोता"

................कलियुग में जम्बूद्वीप के भारतखंड में उत्तरप्रदेश नाम का एक राज्य था. वंशवाद के विरोध में एक ही परिवार की प्रमुखता वाली समाजवादी सरकार का शासन था. कलियुग के जिस काल की यह कहानी है, उस काल में कमजोर राजा के मजबूत सलाहकारों का युग था. "बाबू" टाइप के अधिकारी ही असली राजा थे, जो साहब कहलाते थे. उस राज्य में एक बंगाली प्रजाति का एक बादशाह जैसी शानोशौकत से जीने का शौकीन "बाबू" यानी साहब था. सत्ता की ताकत में उसे आदमी को पहचानने में दिक्कत आने लगी थी. उसने अपने घर और दफ्तर में आने-जाने वालों की फितरत को पहचानने के लिए एक "तोता" पाला. "तोता" विशिष्ट गुण वाला था. वो हर आने-जाने वाले को देखकर उसकी सबसे बड़ी खासियत के बारे में चिल्ला-चिल्लाकर साहब को सचेत कर देता था. इससे उन्हें जागरूक रहने में मदद मिलती थी. इस खामख्याली में उन्होंने आने-जाने वालों से रोत-टोक का बैरियर हटा दिया. लोग आते और तोते से अपना सर्टिफिकेट जारी करवा लेते. इस व्यवस्था में एक दिन एक समस्या खड़ी हो गयी. साहब के लिए चाँद-तारे और सारे लाने की व्यवस्था करने वाले ...
संसद में चिल्ल-पों Posted On May 11, 2012 Tags : . A A A  -अरविन्द त्रिपाठी आज एक बार फिर संसद हंगामे के भेंट चढ गयी. इसकी वजह संसद के अंदर मल-मूत्र की बदबू ना थी, वरन दलित-सम्मान और दलित-वोट-बैंक पर अधिकाधिक काबिज होने के लिए राजनेताओं की ऎसी गतिविधि थी जिसे विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल लगाने का प्रारम्भ है. वजह एक “कार्टून” है. देश को धार्मिक आधार पर साफ़-साफ़ बाँट चुके राजनेताओं ने समाज को जातीय आधार पर खेमेबंद करने के लिए राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है. उक्त हंगामाखेज कार्टून ना तो मोहम्मद  साहब पर था और ना ही हिन्दू देवी-देवताओं का था. पांच साल पहले छपी कक्षा-11 में नागरिक शास्त्र विषय की पुस्तक में छपे इस कार्टून को प्रकाशित किया गया था.  जिसमें आजादी के बाद संविधान के निर्माण में ज्यादा समय लगने से नाराज नेहरू जी को हाथ में हंटर लिए और घोंघे पर सवार बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर को दिखाया गया है. बाबा साहब पहली बार निशाने पर नहीं थे. अरुण शौरी की “वर्शिपिंग फ़ाल्स गाड” पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद भी दलित सम्मान के प्रश्न पर देश-व्य...
जब लिखना और दिखना हो...... ....अरसे बाद फिर से ब्लॉग-मंच पर उपस्थित हुआ हूँ. वजह साफ़ है की जब विचारों की धारा सूख गयी सी लगती हो तो नया कुछ भी उत्पन्न नहीं हो पाता. मन पर यह व्यामोह भी हावी होता है की किसे और कितना लिखा जाए ???? फिर भी अवचेतन मन में चलनी वाली वैचारिक आंधियां कुछ बेहतरी की दिशा में काम करती ही रहती हैं. चलिए, फिर से एक नयी शुरुआत हो........ साफ़ मन और मष्तिष्क के साथ.......

......लो खुल गयी....मुट्ठी !!

......लो खुल गयी....मुट्ठी !!      अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले सोलह महीने के जन-लोकपाल की मांग के आंदोलन के कई चरण देश ने देखे हैं. परन्तु पिछले साल के रामलीला मैदान के हाउसफुल और मुम्बई के एम.सी.आर.डी. ग्राउंड के सुपर फ्लॉप से होते हुए जंतर-मंतर मैदान तक टीम अन्ना के आंदोलन के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया. आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी का सफल तरीका, “अनशन” अन्ना हजारे के नेतृत्व में चली भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम को ताकत देने का हथियार बन कर उभरा. देश के राजनेताओं के तमाम आरोपों और आक्षेपों को सहते हुए इस टीम ने अपने लक्ष्य यानी जन-लोकपाल कानून की मांग के प्रति समर्पण तो जाहिर कर दिया है पर उसे लागू करवा पाने के लिए अपनाया गया रास्ता अभी भी बहुत धुंधला और पथरीला है. टीम अन्ना के द्वारा ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का नारा लगाते-लगाते ‘सत्ता-परिवर्तन’ और सत्ता को अपने हाथ में लेने का निर्णय एक अंधी सुरंग में प्रवेश कर जाने जैसा   आभास देता है, जहां से लक्ष्य के और दूर होते जाने की संभावना बढ़ती जाती है. सरकार और दूसरे राजनीतिक दल इस पूरी टीम को इसी चुन...

भू-जल दिवस के सन्दर्भ में कैनविज़ टाइम्स में २० जुलाई को प्रकाशित लेख

पानी रहेगा तो जिंदगी रहेगी      यह हकीकत है कि उत्तर प्रदेश के शासन ने भूजल संरक्षण के लिए कागजों पर बहुत कुछ किया है। लेकिन समाज के साथ मिलकर उन्हें जमीन पर उतारने का काम अभी बहुत बाकी है। काश! हर बरस आने वाले भू-गर्भ जल दिवस पर हम प्रदेशवासी भी जाग जाते। काश! इसे हम महज एक आयोजन न मानकर संकल्प , समीक्षा और भू-गर्भ जल संरक्षण आदेशों व सुन्दर काम के सम्मान का मौका बना पाते। माइक संभालने की बजाय फावड़ा उठा पाते। किंतु यह हो नहीं पा रहा।          जानने की बात है कि उत्तर प्रदेश देश का पहला प्रदेश है , जिसने मनरेगा के तहत तालाबों के नाम पर बन रही चारदीवारियों की बड़ी बेवकूफी सुधारकर उसे पानी आने के रास्ते की तरफ से पूरा खुला रखने का आदेश जारी किया। मनरेगा तालाबों के लिए जगह के चुनाव में समझदारी भरे निर्णयों का होना अभी बाकी है।            उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के राजस्व परिषद द्वारा जारी चारागाह , चकरोड , पहाड़ , पठार व जल संरचनाओ...