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प्राथमिक शिक्षा और भ्रष्टाचार का समाजवादी माडल


प्रत्येक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय में ग्राम शिक्षा समिति नाम के सरकारी बैंक खाते में ग्राम-प्रधान और प्रधानाध्यापक की साझेदारी होती है। प्रति वर्ष विद्यालय के बच्चों की ड्रेस, मध्यांह भोजन की कंवर्जन-कास्ट और विद्यालय की रंगाई-पुताई की लागत आदि इस खाते में आती है। विगत चार वर्षों से ड्रेस आपूर्ति करने की कम्पनी का निर्धारण केंद्रीय स्तर हो जाता है, जिसमें अघोषित रूप से सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को गुप्त निर्देश दे दिया जाता है की ड्रेस की आपूर्ति फ़लाँ सप्लायर ही करेगा। जिस दर पर ड्रेस की आपूर्ति करनी होती है, उस दर की चेक सप्लायर  प्रधानाध्यापक से एकत्र कर लेता है।प्रधान, प्रधानाध्यापक, खंड शिक्षा अधिकारी और बेसिक शिक्षा अधिकारी तक पहुँचने वाली रक़म के बँटने के बाद शेष धन से बच्चों को ड्रेस उपलब्ध कराई जाती है। प्रत्येक विद्यालय को वार्षिक रंगाई-पुताई के नाम पर पाँच से साढ़े सात हज़ार रुपये प्रदान किए जाते हैं, जिसके लिए कड़े दिशा-निर्देश भी जारी किए गए होते है कि पेंट किस कम्पनी का होगा और पुताई किस रंग की होगी, आदि-आदि। आज के बड़े आकार के विद्यालय-परिसर की पुताई के लिए आने वाली रक़म बिलकुल पर्याप्त नहीं होती है। इसी तरह मिड-डे-मील के नाम पर राशन सीधे कोटेदार के पास आता है और कंवर्जन कास्ट ग्राम शिक्षा समिति के खाते में आती है। वर्तमान में ग्राम-प्रधानों ने खाना बनवाने की ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ले रखी है और प्रधानाध्यापकों ने चेक पर हस्ताक्षर कर ज़िम्मेदारी से गंगा नहा ली है। लेकिन इन परिस्थितियों में भी प्रत्येक वर्ष आडिट तो सरकारी नौकर यानी प्रधानाध्यापक का ही होता है।

   प्राथमिक शिक्षा समिति की उपरोक्त अनार्थिक-व्यवस्था की परिस्थितियों में अब मूल घटनाक्रम पर आता हूँ। तो इस बार फिर, आर्यावर्ते, भारतखंडे, उत्तरप्रदेश, कानपुर जनपदे, पतारा विकास खंडे एक नया आडीटर आया। हर बार की ही तरह। ईमानदार सरकार के सभी नियम-क़ानून को रटते और रटाते हुए। हर विद्यालय में हर साल ही आडिट होना होता है, ताकि समस्त वित्तीय कार्य नियमानुसार हो सके। या ऐसा समझिए कि जो वित्तीय कार्य हुआ है उसे नियमानुकूल कर दिया जाए। उसकी नियमबद्धता और न्यायप्रियता से भाजपाई मानसिकता के प्रधानाध्यापकों ने राहत की साँस ली। उसने प्रत्येक प्रधानाध्यापक से मिड-डे-मील की आपूर्ति के प्रमाण-स्वरूप बोरों की माँग की ताकि राशन की आपूर्ति का वास्तविक सत्यापन हो सके। इसी तरह पुताई में प्रयोग आने के बाद घिसे हुए ब्रश और टायलेट-क्लीनर के ख़ाली डिब्बे माँगे। इस तरह के कठिन सवालों के जवाब प्रधानाध्यापकों के वश में ना थे। 
आख़िर आडीटर महोदय द्वारा सुझाए गए अध्यापक-नेता ने भेंड़ों की तरह काँप रहे सभी प्रधानाध्यापकों को बताया कि केवल दो हज़ार देकर इस ईमानदार व्यवस्था के दरिया को पार किया जा सकता है। आख़िर समझौता मात्र १,५००/- रुपए की छोटी सी रक़म में हो गया। प्रत्येक विकास-खंड में औसत रूप से तीन लाख रुपए एकत्र हुए। यानी कानपुर जिले से लगभग तीस लाख। प्रदेश के आठ सौ पच्चीस से अधिक विकास-खंडों से लगभग तीन करोड़ से अधिक रुपए एकत्र होने का अनुमान लगाया जा सकता है। इस धन को राष्ट्रवादी सरकार के संरक्षण में बहुत समाजवादी तरीक़े से बँटवारा हो रहा है। यानी "जिसकी जितनी कुर्सी भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी"।अब बात आती है उस प्रजा की, जिसे कहते तो जनता-जनार्दन हैं, किंतु उसी के नाम पर आसानी से भ्रष्टाचार किया जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता और उपादेयता संवर्धन के स्थान पर केवल उसके शोषण में मस्त प्रशासनिक व्यवस्था को तब तक सफलता नहीं मिल सकती है जब तक समाज के अंदर से सुधार और व्यवस्था-परिवर्तन की समझ विकसित नहीं होगी।

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