........क्या ख़ाक इक्कीसवीं सदी आई है ? ज़माना आज भी नहीं बदला . कहते हैं की आदमी चाँद को पार कर मंगल सहित दुसरे ग्रहों में जाने और बसने की फिराक में है.अचानक चचा चकल्लसी बडबडाते हुए गली के कुन्ने से निकले. उनकी बातों में एक अजीब सा दंभ और दर्प था. ऐसा लगा की भले ही हम अब दीपावली में सौ रुपये के मिट्टी के ही बने गणेश-लक्ष्मी की पूजा क्यों न करने लगे हों, पर हैं पूरी तरह से पिछड़े हुए ही. हिम्मत करके टोंका तो वो फुलझडी जैसे फुसफुसाए और मुस्कराते हुए बोले क्या ख़ाक प्रोग्रेस की है तुम सबने ? तुम सबसे अच्छे तो हमारे जमाने थे. मैं घबराते हुए बोला की ऐसा क्या जुलुम हो गया हमारे जमाने में ? कहीं ये कट्टो गिलहरी बनी श्वेता तिवारी को तो नहीं देख आये ? या फिर रा-वन फिल्म के बहुत तकनीकी तरह से बने होने से उसका भोजपुरी एडिशन न निकल पाने से बौराये हों.पर सोंच नहीं पाया तो डरते-सहमते फिर पूछने का साहस जुटाने लगा. तभी वो बोले की वाह वो भी क्या दिन थे जब हम खतोकिताबत करते थे. उस प्रेम लायक उम्र में हम कलम से कागज़ पर कलेजा निकाल कर रख देते थे. फिर बुरा ...
मूलतया कनपुरिया - बेलौस, बिंदास अन्दाज़ के साथ एक खरी और सच्ची बात का अड्डा…